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KAPH KE VISHISHT KARM

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• कफ के विशिष्ट कर्म

•कफ के भेद

“श्लेष्मा तु पंचधा “। (अ ० हृ ० सू ० 11/15)

श्लेष्मा पांच प्रकार का होता है –

( 1 ) श्लेषक कफ , ( 2 ) क्लेदक कफ , ( 3 ) बोधक कफ , ( 4 ) तर्पक कफ तथा ( 5 ) अवलम्बक कफ ।

( 1 ) क्लेदक कफ

“अन्नमादानकर्मा तु प्राणः कोष्ठं प्रकर्षति ।
तद्रवैर्भिन्नसंघातं स्नेहेन मृदुतां गतम् ।।”( च ० च ० 15/5 )

आदानकर्मा प्राण वायु कोष्ठ में ( निगलने की क्रिया द्वारा ) ले जाता है , वहां पर उपस्थित द्रव द्वारा उसका संघात नष्ट हो जाता है तथा द्रव के स्नेह अंश द्वारा यह मृदु हो जाता है ।

( 2 ) अवलम्बक कफ

“उरःस्थस्त्रिकसन्धारणमात्मवीर्येणान्नरससहितेन हृदयावलम्बन करोति “।।( सु ० सू ० 21/13)

उर [ वक्ष ] में स्थित कफ अपने वीर्य [ शक्ति से त्रिक स्थानों को धारण करता तथा अन्न रस की सहायता से हृदय का अवलम्बन करता है ।

( 3 ) बोधक कफ

“जिह्वामूलकण्ठस्थो जिह्वेन्द्रियस्य सौम्यत्वात् सम्यक् रसज्ञाने वर्तते ।।”( सू ० सु ०21 / 13)

बोधक कफ जिहा मूल तथा कण्ठ में रहकर अपनी सौम्यता से जिहेन्द्रिय को सब प्रकार के रस ज्ञान में प्रवृत्त कराता है ।

( 4 ) तर्पक कफ

“शिरःस्थं स्नेहसंतर्पणाधिकृतत्वादिन्द्रियाणामात्मवीर्येणानुग्रहं करोति ।।”( सु ० सू ० 21/13)

शिर में स्थित स्नेह आदि के संतर्पण का अधिकारी कफ त्वक् आदि ज्ञानेन्द्रियों को अपने प्रभाव से अनुगृहीत करता है अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों के केन्द्र मस्तिष्क को पोषण प्राप्त कराता है ।

( 5 ) श्लेषक पित्त

“संधिस्थस्तु श्लेष्मा सर्वसन्धिसंश्लेषात् सर्वसंध्यनुग्रहं करोति ।”( सु ० सू ० 21/13)

संन्धियों में स्थित श्लेष्मा समस्त सन्धियों का संश्लेषण करता है । इस प्रकार वह समस्त सन्धियों का अनुग्रह करता है

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