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KALKA KALPANA

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कल्क  कल्पना

 परिभाषा

“द्रव्यमार्द्र शिलापिष्टं शुष्कं वा सजलं भवेत् ।

प्रक्षेपावापकल्कास्ते तन्मानं कर्षसंमितम् ।। ‘ ( शा . सं . म . ख . 5/1 )

अर्थात् आर्द्रद्रव्य को शिला पर पीसकर या शुष्क द्रव्य के चूर्ण में जल मिलाकर शिला पर पीसकर जो पिण्ड , चटनी या लुगदी बनाई जाती है , उसे कल्क कहते हैं ।

प्रक्षेप और आवाप कल्क के पर्याय है ।

इसकी मात्रा एक कर्ष ( 12 ग्राम ) है ।

जिस चटनी का सीधे भक्षण किया जाता है , उसे कल्क कहते हैं । स्नेहमूर्च्छन एवं स्नेहपाक ( तैलपाक , घृतपाक ) , आसव अरिष्ट निर्माण में द्रव्य की चटनी या पिण्ड का प्रयोग किया जाता है , उसे कल्क , प्रक्षेप और आवाप तीनों नाम से कहा जाता है ।

कल्क की मात्रा : -कल्क का प्रयोग एक कर्ष ( 12 ग्राम ) की मात्रा में करना चाहिए ।

प्रक्षेप द्रव्यः —

“कल्के मधु घृतं तैलं देयं द्विगुण मात्रया ।

सिता गुडौ समौ दद्यात् द्रवादेयाश्चतुर्गुणाः ।।” ( शा . सं . म . ख . 5/2 )

अर्थात् यदि कल्क में मधु , घृत , तैल मिलाना हो तो कल्क से द्विगुण मात्रा में मिलाना चाहिए । यदि शर्करा , गुड मिलाना हो तो समान भाग तथा कोई द्रव मिलाना हो तो चतुर्गुण मिलाना चाहिए ।

कल्क का उपयोग :

1. कल्क औषध रूप में खाया जाता है ।

2. स्नेहपाक और स्नेहमूर्च्छना में कल्क डालकर भर्जन किया जाता है ।

3. प्रलेप एवं प्रदेह के रूप में कल्क का प्रयोग किया जाता है ।

4. व्रणों को शुद्ध करने एवं शोथ को दूर करने के लिए कल्क का प्रयोग होता है । 

5. प्रमथ्या निर्माण कल्क डालकर किया जाता है ।

निम्बकल्क :

“लेपानिम्बदलैः कल्कोव्रणशोधनरोपणः ।

भक्षणाच्छर्दिकुष्ठानि पित्तश्लेष्मकृमीञ्जयेत् ।।” ( शा . सं . म . ख . 5/5 )

अर्थात् निम्बपत्र का कल्क लगाने से व्रण का शोधन एवं रोपण करता है । इसके सेवन से वमन , कुष्ठ , पित्तविकार , कफविकार और कृमि नष्ट होते है ।

रसोनकल्क :

“शुद्ध , कल्को रसोनस्य तिलतैलेन मिश्रितः ।

वातरोगाञ्जयेत् तीव्रान् विषमज्वरनाशनः ।।” ( शा . सं . म . ख . 5/7 )

अर्थात् शुद्ध ( छिलका निकला हुआ ) रसोन का कल्क तिलतैल मिलाकर खाने से भीषण वातरोग ( अपतन्त्रक , पक्षाघात , अर्दित आदि ) तथा विषम ज्वरों को नष्ट करता है । रसोनकल्क का उपयोग पारदशोधन में भी किया जाता है

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