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KALA SHARIR

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कला शारीर

• कला की परिभाषा

” कलाः खल्वपि सप्त भवन्ति धात्वाशयान्तर मर्यादाः । ” ( सु.शा. ४/५ )

शरीर में कलाएँ सात प्रकार की होती हैं , जो धातु और आशय इनके बीच की मर्यादा है ।

अतः धातु और आशय इनकी मर्यादा का सही अर्थ होगा- धातु के अन्दर या आशय के अंततः ( अन्दर ) आच्छादन करने वाली जो पतली रचना है , वही कला है । जिसे हम अन्तस्था : कला ( Inner covering ) कहते हैं ।

• स्वरूप

जैसे काष्ठ ( लकड़ी ) को छिलने ( काटने ) से सारभाग दिखाई देता है , वैसे ही मांस को छिलकर निकालने से धातु दिखाई देती है ।

स्नायुओं ( तन्तुओं- Fibrous membrane ) से ढके हुए और जरायु ( झिल्ली Serous membrane ) से व्याप्ते तथा श्लेष्मा ( Mucous membrane ) से वेष्टित ( निर्मित ) भागों को कला भाग कहते हैं।

• कलाओं के भेद , स्थिति एवं प्रयोजन

1.मांसधरा कला

“तासां प्रथमा मांसधरा नाम ; यस्यां मांसे सिरा स्नायु धमनी स्रोतसां प्रताना भवन्ति । “( सु.शा. ४/८ )

 इन सात कलाओं में प्रथमा मांसधरा नामक कला है । जिस मांसधरा के मांस में सिरा , स्नायु , धमनी और स्रोतसों की शाखा – प्रशाखाएँ होती हैं ।

2. रक्तधरा कला

“द्वितीया रक्तधरा नाम ; मांसस्याभ्यन्तरतः , तस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृत्प्लीहोश्च भवति ।।” ( सु.शा. ४/१० )

दूसरी कला का नाम रक्तधरा है , यह मांस के भीतर होती है । उसमें विशेषतया सिराओं में और यकृत तथा प्लीहा में रक्त होता है ।

 3. मेदोधरा कला

” तृतीया मेदोधरा नाम ; मेदो हि सर्वभूतानामुदरस्थमण्वस्थिषु च , महत्सु च मज्जा भवति । ” ( सु.शा. ४/१२ )

तीसरी मेदोधरा नामक कला है । मेद सब प्राणियों के उदर में तथा छोटी अस्थियों में होता है ।  और बड़ी अस्थियों में मज्जा होती है।

4. श्लेष्मधरा कला

“चतुर्थी श्लेष्मधरा नाम ; सर्वसन्धिषु प्राणभूतां भवति ।”( सु.शा. ४/१४ )

चौथी श्लेष्मधरा नामक कला है , जो प्राणियों की सब सन्धियों ( Joints ) में रहती है ।

5. पुरीषधरा कला

” पञ्चमी पुरीषधरा नाम , याऽन्तः कोष्ठे मलमभिविभजते पक्वाशयस्था । ” ( सु.शा. ४/१६ )

 पाँचवी पुरीषधरा ( मलधरा ) नामक कला है । जो कोष्ठ के अन्दर पक्वाशय में स्थित मल को विभक्त करती है ।

6. पितधरा कला

” षष्ठी पित्तथरा नाम ; या चतुर्विधमन्नपानमाशयात् प्रच्युतं पक्वाशयोपस्थितं धारयति । ” ( सु.शा. ४/१८ )

 छठी पित्तधरा नामक कला है । जो आमाशय से निकलकर पक्वाशय की ओर जाने के लिए आये हुए उपभुक्त चारों प्रकार के अनपान को धारण करती है ।

7. शुक्रधरा कला

 ” सप्तमी शुक्रधरा नाम ; या सर्वप्राणिनां सर्व शरीर व्यापिनी । ” ( सु.शा. ४/२० )

सातवीं शुक्रधरा नामक कला है । जो सब प्राणियों के सर्व शरीर में व्याप्त रहती है ।

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