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Kaay chikitsa vivechana

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कायचिकित्सा विवेचन
( syllabus 1st point -part 1)

• ‘काय’, ‘चिकित्सा’ निरूक्ति और उनकी परिभाषा और पर्यायवाची शब्द।
• ‘कायचिकित्सा’ की परिभाषा, ‘भेषज’ की परिभाषा।


काय शब्द की निरुक्ति

1 . ” चीयतेऽन्नादिभिरिति कायः “

अर्थात् अन्नादि से जिसका पोषण होता है उसे ‘ काय ‘ कहते हैं । ‘ काय ‘ शब्द की निष्पत्ति ” चिञ् – चयने ” धातु में ‘ ध ‘ प्रत्यय लगाने से होती है । इसका अर्थ है ‘ देह ” ।

2. ‘ काय ‘ का एक अर्थ ‘ शरीर ‘ भी है । ‘ शरीर ‘ शब्द ‘ श्रृ – हिंसायाम् ‘ धातु से ‘ इरिन् ‘ प्रत्यय लगाने से बना है ।

3. ‘ कायति शब्दायते इति कायः । ‘

निरुक्ति से ‘ काय ‘ का एक अर्थ ‘ मन ‘ भी है ।

काय शब्द परिभाषा

शरीर मन तथा जठराग्नि को काय की संज्ञा दी गई है ।

अन्नादि से जिसका पोषण होता है उसे काय कहा गया है।

काय शब्द पर्याय

‘ अमरकोश ‘ में काय शब्द के निम्न पर्याय बताये गये हैं –

कलेवर , गात्र , वपु , शरीर , बह्म , विग्रह , काय , देह , मूर्ति , तनु एवं तनू – ये समस्त पर्याय एकार्थवाची हैं , इनसे ‘ काय ‘ का ही बोध होता है ।

चिकित्सा शब्द की निरूक्ति

विभिन्न ग्रंथों में चिकित्सा की निम्न निरुक्ति वर्णित की गई हैं

1 . ” केतितुम् इच्छति इति चिकित्सति , चिकित्सति इति चिकित्सा । “

2 . ” या क्रिया व्याधिहरणी सा चिकित्सा निगद्यते ॥ ” ( भाव प्रकाश )

3 . ” चिकित्सा रोगनिदानप्रतिकारे । ” ( वैद्यक शब्द सिन्धु ) “

4. ” चिकित्सा तत् प्रतीकारः । ” ( राज निघण्टु )

चिकित्सा की परिभाषा

1. व्याधि के हरण ( नाश ) करने की क्रिया को चिकित्सा कहते हैं ।
2 . रोग के उत्पादक कारण को दूर करना चिकित्सा है ।

3. रोग का प्रतिकार करना ही चिकित्सा है ।

चिकित्सा के पर्याय

प्राचीन ग्रंथों में चिकित्सा पद के कई पर्याय मिलते हैं यथा-

क्रिया , कर्म , जायु , वैकरण , प्रतिकर्म , भिषककर्म , वैद्यक कर्म , भिषग्जित , प्रतिषेध , प्रतीकार , कर्म , चेष्टा , प्रशमन , प्रवृत्ति , शमन , रोगापनयन , व्याधिहर , प्रायश्चित , चिकित्सित , पथ्य , साधन औषध , प्रकृति स्थापन , विग्रह , उपक्रम तथा उपचार आदि ।

कायचिकित्सा की परिभाषा

‘ काय चिकित्सा ‘ का शाब्दिक अर्थ है- काय की चिकित्सा ।

विभिन्न आचार्यों ने इस विषय में भिन्न – भिन्न मत प्रस्तुत किए हैं । जिनमें से कुछ यहाँ वर्णित किए जा रहे हैं

1 . ” कायस्यान्तरग्नेश्चिकित्सा । ” ( चक्रपाणि )
2 . ” काय चिकित्सा इति कायस्य अन्तरग्नेश्चिकित्सा । ” ( गंगाधर )
3 . ” जाठर : प्राणिनामग्निः कायः इत्यभिधीयते ।
यस्तं चिकित्सेत् सीदन्तं स वै काय चिकित्सकः ॥ ” ( भोज )

‘ काय ‘ शब्द से सम्पूर्ण शरीर का बोध होता है एवं शरीर दोष धातु एवं मल का संघात है । अत : इनकी विकृति से उत्पन्न होने वाले सर्वाङ्ग शरीर आश्रित रोगों की चिकित्सा को “ काय ” चिकित्सा कहते हैं ।

अत : चिकित्सा के जिस भेद के अंतर्गत सर्वाङ्ग शरीरगत ज्वरादि रोग , मानसिक रोग , सांस्थानिक रोग यथा हृदय रोग एवं अग्नि विकृति जन्य रोगों की चिकित्सा का वर्णन हो उसे काय चिकित्सा कहते हैं ।

भेषज की परिभाषा

“भेषं रोगभयं जयति येन इति भेषजं तस्य भावः कर्म वा भैषज्यम् ।”

अर्थात् जिसके द्वारा रोगभय को जीता जाता है , उसे भेषज कहते हैं , उसका भाव या कर्म ही भैषज्य कहलाता है ।

” भिषज्यन्ति चिकित्सन्ति रोगान् निवर्तयन्ति वा अनेनेति भेषजम् । भेषजमेव भैषज्यम् । “

अर्थात् जिसके द्वारा रोगों की चिकित्सा की जाती है या रोगों को हटाया जाता है , उन सब उपायों को भेषज कहते हैं । भेषज ही भैषज्य है ।

 

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