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KARY KARANBHAV EVAM VIVIDHAVAD

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कार्य – कारणभाव एवं विविधवाद

सांख्य दर्शन ने कार्य – कारणवाद को माना है । इसी के आधार पर इनका ‘ सत्कार्यवाद ‘ है ।
कोई भी कार्य बिना कारण के नहीं होता है । कार्य अपने उपादान ( उत्पत्ति के ) कारण में अवश्य ही सूक्ष्मावस्था में होता है , यदि न हो तो उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है

कारण का स्वरूप –

जिससे जिसकी उत्पत्ति होती है , उसे ( उत्पन्न करने वाले को ) ‘ कारण ‘ और जो उत्पन्न होता है उसे ‘ कार्य ‘ कहते हैं ।

कारण के भेद –

कारण तीन प्रकार का होता है –
१ . समवायिकारण ( उपादान कारण ) ,
२. असमवायि कारण और
३. निमित्त कारण ।

१. समवायिकारण -जो समवेत रहते हुये कार्य उत्पन्न करे , उसे समवायिकारण कहते है । यह कारण अयुत्तसिद्ध ( अपृथग्भाव ) वस्तुओं में नित्य सम्बन्ध वाला होता है

जैसे – तन्तु और पट ( कपड़ा ) का सम्बन्ध समवाय है । यहां तन्तु वस्त्र का समवायिकारण होता है । इसी प्रकार पंचमहाभूत भी शरीर रूपी कार्य का समवायिकारण होता है ।

२. असमवायिकारण -वह है जो कार्य या कारण के साथ एक पदार्थ में समवाय सम्बन्ध से रहता हुआ कारण होता है

जैसे — तन्तु का संयोग पट ( वस्त्र ) का असमवायिकारण है ।
दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि कार्य कारण से इस प्रकार सम्बन्धित रहता है कि बिना इसके कार्य की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है । यहां तन्तु पट ( वख ) का समवायिकारण है , किन्तु तन्तु में कपड़े की उत्पत्ति के लिये तन्तुओं का आपस में संयोग होना आवश्यक होता है । यदि इन तन्तुओं का आपस में संयोग न हो तो कार्य रूप वस्त्र की उत्पत्ति नहीं होती है ।

३. निमित्तकारण – कार्योत्पत्ति में जो कारण समवायिकारण और असमवायिकारण से भिन्न हो , उसे ‘ निमित्त कारण ‘ कहते हैं यह कारण कार्योत्पत्ति में सहायक होता है ।

जैसे — पट ( वस्त्र ) की उत्पत्ति में तूरी – वेम आदि या घट ( घड़ा ) की उत्पत्ति में दण्ड – चक्र आदि निमित्त कारण होते है ।

•कार्य – कारण सिद्धान्त –

आयुर्वेद में कार्य – कारण सिद्धान्त की पुष्टि की गयी है । सांख्य दर्शन में इसी कारण और कार्य के आधार पर ‘ सत्कार्यवाद ‘ के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया गया है ।

• कार्य – कारण भाव को व्यक्त करने वाले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धान्त स्वीकार किए गए है – सत् कार्यवाद और असत् कार्यवाद ।

सत् कार्यवाद

“असत् कारणात् उपादान ग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात्
शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् । “

अर्थात् असत् कारण से सत्कार्य की उत्पत्ति नही हो सकती । उपादान ग्रहण से ही सत्कार्य की उत्पत्ति होती है । सभी प्रकार के कारणों से सभी कार्यों की उत्पत्ति सम्भव नहीं । शक्तिमान कारण से शक्य वस्तु की उत्पत्ति होती है अत : कारण की सत्ता होने से सत्कार्य होता है ।

• असत् कारणात् – जिस वस्तु का अस्तित्व नही होता उसकी उत्पत्ति कदापि सम्भव नही । सत्ता युक्त वस्तु ही सत् होती है । सत्ता रहित वस्तु असत् होती है । जैसे मिट्टी कारण सत् है तथा घड़ा रूप कार्य भी सत् है ।

• उपादानग्रहणात् – ‘ उपादान ‘ से तात्पर्य है – उत्पन्न करने वाला पदार्थ , सांख्य ने ‘ उपादान नियमात् ‘ कहा है , इसका अर्थ है कि सत् कारण से ही सत् कार्य की उत्पत्ति हो सकती है , असत् की उत्पत्ति नहीं होती है ।

किसी भी वस्तु की उत्पत्ति उसके उस विशिष्ट भाव ( पदार्थ ) से होती है जिसमें वह कार्य रूप में अव्यक्तावस्था में पड़ा रहता है ,
जैसे – दही ( कार्य ) का उपादान कारण दुग्ध ही है जल या तैल नहीं है । यदि दुग्ध नहीं होगा तो दही जल या तैल से नहीं बनेगा । इससे सिद्ध होता है कि कार्य अपने कारण में विद्यमान रहता है ।
किसी भी कारण से किसी भी कार्य को उत्पन्न नहीं किया जा सकता है ।

• सर्वसम्भवाभावात् – सभी कारणों से सभी कार्यों की उत्पत्ति नही हो सकती ।
जैसे चांदी की उत्पत्ति धूल से नही हो सकती । अलग अलग कारणों से अलग अलग कार्यों की उत्पत्ति होती है ।

• शक्तस्य शक्यकारणात् – जिस कारण में जिस कार्य को उत्पन्न करने की सामर्थ्य होती है । वह कारण ही उस कार्य को उत्पन्न कर सकता है । अशक्त कारण में कार्य उत्पादन का अभाव होने से उससे शक्य कार्य की उत्पत्ति सम्भव नही ।
जैसे – भेड भेड को पैदा कर सकती है इन्सान को नहीं ।

• कारण भावात् च – कारण भाव से कार्य उत्पन्न होने से पहले अपने कारणभाव में विद्यमान रहता है । जैसे उत्पन्न होने वाला वृक्ष अपने कारण भाव बीज रूप से अव्यक्त रूप में रहता है ।

•सत्कार्यवाद के भेद – सत्कार्यवाद् के दो भेद हैं –
१ . परिणामवाद और २ . विवर्तवाद ।

• असत्कार्यवाद

यह न्याय और वैशेषिक का सिद्धान्त है । ये कार्य के पहले कारण या किसी सत्ता का होना नहीं मानते हैं । इसी से इसे ‘ असत्कार्यवाद ‘ या ‘ आरम्भवाद ‘ कहते हैं ।
यहां कारण में कार्य की सत्ता उत्पत्ति से पूर्व नहीं रहती है । पदार्थ उत्पन्न होने के बाद ही अस्तित्व में आता है ।
दूर – दूर तक उत्पन्न हुये पदार्थ ( कार्य ) का कोई अस्तित्व नहीं होता है , अपितु यह एक नयी रचना होती है । कार्य असत् ( अविद्यमान ) होते हुये भी उत्पन्न हो जाता है , इसलिये इस सिद्धान्त को ‘ असत्कार्यवाद ‘ या ‘ आरम्भवाद ‘ कहते हैं ।

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