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KAL NIROOPAN

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काल निरूपण

“कलनात् सर्वभूतानां स कालः परिकीर्तितः “‘

अर्थात् जो समस्त जीव सृष्टि का संकलन करता है , वह काल है ।

लक्षण – आकाशादि के समान काल और दिशा भी ‘ अमूर्त कारण द्रव्य ‘ है । ये एक , निरवयव ( बिना अवयव के ) , नित्य और सर्वव्यापी है , किन्तु इनके उपाधि अनेक है । ‘

‘ चरक ‘ ने शीत , उष्ण ( गर्मी ) , वर्षा के लक्षणों से युक्त हेमन्त , ग्रीष्म , वर्षा , शिशिर , वसन्त और शरद् ये छ : ऋतुओं के स्वरूप वाले संवत्सर को ही काल माना है ।

‘ गंगाधर ‘ के अनुसार काल चक्र की तरह निरन्तर गतिशील हैं ।
चरक ने कहा है कि काल परिणाम को कहा जाता है ।

काल के भेद –
चरक ने विमान स्थान में काल के दो भेद वर्णित किये हैं
१. नित्यग काल – इसमें ऋतुओं के अनुसार आहार – विहार का सेवन करने से व्याधियां नहीं होती हैं ।
२. आवस्थिक काल – रोग के अवस्थानुसार रोगी को आहार – विहार का पालन करना चाहिये ।

पुन : काल ‘ संवत्सर ‘ और ‘ आतुरावस्था ‘ भेद से दो प्रकार का होता है ।
‘ संवत्सर ‘ ‘ अयन’- उत्तरायण , दक्षिणायन भेद से दो प्रकार का ।

‘ ऋतु’- शीत , गर्मी ,वर्षा भेद से तीन प्रकार का ।
‘ ऋतु ‘ – हेमन्त , ग्रीष्म , वर्षा , प्रावृट् , शरद् वसन्त : छ : प्रकार के हैं ।
इनमें से प्रावृट , शरद् और वसन्त ये तीन ऋतुयें साधारण मानी गयी है क्योंकि इनमें न तो अधिक बरसात होती है , न ही अधिक ठंडक या गर्मी पड़ती है । उक्त ६ ऋतुयें दोषों के संशोधन के लिये उचित बतायी गयी हैं।

आयुर्वेद में काल का महत्त्व

-चरक के सूत्र स्थान यज्ज : पुरुषीय अध्याय में भिक्षु आत्रेय ने रोग और पुरुष दोनों की ही उत्पत्ति में ‘ काल ‘ को कारण माना है ।
साथ ही यह भी कहा है कि सम्पूर्ण सृष्टि काल के ही वशीभूत है और सृष्टि के सभी कार्यों के होने में ‘ काल ( Time Theory ) ही कारण है ।

‘ -‘आयुर्वेद ‘ आयु का ज्ञान है , भावप्रकाश ने शरीर ( पांचभौतिक ) और जीव के संयोग को जीवन कहा है । जब तक इनका संयोग होता है तब तक ‘ काल ‘ को आयु कहते हैं ।
-अकाल ( बिना समय ) के निद्रा के सेवन से या त्याग करने से वह ( काल ) सुख और आयु को दूसरी काल – रात्रि के समान नष्ट कर देता है।

-मनुष्य की जरावस्था और मृत्यु काल के आधीन माना गया है ।
-रोग के तीन कारण माने गये हैं — काल , अर्थ ( इन्द्रियों के विषय ) और कर्म का हीन , मिथ्या , अतियोग होना ।

-चरक संहिता कल्प स्थान में औषधियों का संग्रह कालानुसार करने का निर्देश दिया गया है ।

-आयुर्वेद में नियत काल पर भोजन करना स्वास्थ्यकारक कहा गया है ।

-सुश्रुत ने पुरुषों में रक्तादि धातुओं की परिपक्वता का काल 25 वर्ष और स्त्रियों में 16 वर्ष का काल ( अवस्था ) माना है ।

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