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INTRODUCTION OF CHARAK (चरक परिचय)

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आयुर्वेद के अनुसार आचार्य चरक का परिचय

चरक परिचय


आचार्य चरक विशुद्ध के पुत्र तथा मैं ऋषि वैशम्पायन के शिष्य एवं कनिष्ठ के राजवैद्य थे।
आचार्य महर्षि चरक की गिनती भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है. यानी कि आज हम जो भी मेडिकल साइंस के बारे में जातने हैं, उसकी बुनियाद महर्षि चरक ने ही रखी थी. वेदों में पता चलता है कि चरक की शिक्षा तक्षशिला में हुई. भावप्रकाश निघंटू में चरक को शेषनाग का अवतार बताया गया है. तथा आचार्य चरक यायावर अर्थात घूम फिर कर शिक्षा लेने वाले कोटी के ऋषि थे ।
इनकी लिखी गई किताब चरक संहिता वैद्यों के अद्वितीय ग्रंथ मानी जाती है. विद्वानों का मानना है कि चरक कुषाण के राजवैद्य थे. कुछ लोग इन्हें बौद्ध काल से भी पहले का मानते हैं.
आचार्य चरक का निवास स्थान पंच नद प्रांत में इरावती एवं चंद्रभागा नदियों के बीच स्थितकपि स्थल ग्राम में था।

एक मत यह भी है कि चरक कोई व्यक्ति न होकर कृष्ण यजुर्वेद की शाखा का नाम है. चरक संहिता का संकलन उसी शाखा के किसी व्यक्ति ने किया हो. इसके बारे में कहा जाता है उस वक्त वैद्यों का एक बड़ा समूह था जो संभवतः मिलकर चरक संहिता का संकलन और उसकी रचना की हो

चरक संहिता परिचय


चरक संहिता में कुल श्लोकों की संख्या 12000 है तथा कुल सूत्र 9295 एवं कुल योग 1950 है।
यह संस्कृत भाषा में लिखा गया एक विशाल ग्रंथ है जिसके 8 भाग हैं. इस ग्रंथ में 120 अध्याय हैं. इसके रचनाकाल के बारे में कहा जाता है कि यह उपनिषदों के बाद और बुद्ध के पूर्व निश्चित हो सकता है. इसकी रचना कनिष्क के समय 78 ई. के लगभग हुआ. त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में कनिष्क के राजवैद्य के रूप में चरक का उल्लेख है.

राजा कनिष्क बौद्ध थे, इसलिए चरक संहिता के बारे में कहा जाता है कि उसी काल में उसकी रचना की गई हो. चरक संहिता को काय चिकित्सा प्रधान ग्रंथ का दर्जा प्राप्त है. काय का अर्थ है फिजिशियन यानी कि जिसमें दवा से इलाज होता है. या जिसमें सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती. इसके विपरीत सुश्रुत संहिता शल्य चिकित्सा प्रधान ग्रंथ है. महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है.
चरक संहिता में कुल आठ स्थान है।

  1. सूत्रस्‍थान – इसे श्लोक स्थान भी कहा जाता है ।इस भाग में औषधि विज्ञान, आहार, विशेष रोग और शारीरिक और मानसिक रोगों की चिकित्‍सा का वर्णन किया गया है.
  2. निदानस्‍थान – आयुर्वेद पद्धति में रोगों का कारण पता करने की प्रक्रिया को निदान कहा जाता है. इस खंड में प्रमुख रोगों और उनके उपचार की जानकारी प्रदान की गई है.
  3. विमानस्‍थान – इस अध्‍याय में भोजन और शरीर के संबंध को दर्शाया गया है और स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक भोजन के बारे में जानकारी दी गई है.
  4. शरीरस्‍थान – इस खंड में मानव शरीर की रचना का विस्‍तार से परिचय दिया गया है. गर्भ में बालक के जन्‍म लेने और उसके विकास की प्रक्रिया को भी इसमें बताया गया है.
  5. इंद्रियस्‍थान – यह खंड मूल रूप में रोगों की प्रकृति और उसके उपचार पर केंद्रित है.
  6. चिकित्‍सास्‍थान – इस प्रकरण में कुछ महत्‍वपूर्ण रोगों का वर्णन है. उन रोगों की पहचान कैसे की जाए और उनके उपचार की महत्‍वपूर्ण विधियां कौन सी हैं, इसकी जानकारी भी प्रदान की गई है.
  7. कल्प स्थान
  8. सिद्धि स्थान– इसमें छोटे अध्‍याय हैं, जिनमें साधारण बीमारियों के बारे में बताया है।

चरक सूत्रस्थान

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