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INDRIYA VIGYAN SHARIR

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इंद्रिय विज्ञान शारीर

• परिचय

• सम्पूर्ण शरीर के लिए विषयों का ग्रहण एवं परित्याग इन्द्रियों द्वारा ही होता है ।

• कोई भी कार्य करने वाला प्रत्यंग या किसी वस्तु का सार भाग प्राप्त करने वाला प्रत्यंग ही इन्द्रिय कहा जाता है ।

•  इन्द्रिय शब्द की निरूक्ति

” इन्द्र आत्मा तस्य साधनं इन्द्रियम् । “

• यहाँ इन्द्रिय शब्द से इन्द्र , आत्मा एवं उसके साधन रूप विषयों का आभास होता है ।

• आत्मा को शरीररूपी सम्पत्ति के सम्पूर्ण ऐश्वर्य सम्पन्न होने के कारण इन्द्र कहा जाता है ।

• इन्द्रिय पंचपंचक का वर्णन

 १. पंच इन्द्रियाँ- श्रोत्र – स्पर्शन – चक्षु – रसना – घ्राण

 २. पंच इन्द्रिय द्रव्य- आकाश – वायु – अग्नि – जल – पृथ्वी  

 ३. पंच इन्द्रिय अधिष्ठान- कौँ – त्वक् – अक्षिणी – जिह्वा – नासिका

 ४. पंच इन्द्रिय अर्थ- शब्द – स्पर्श – रूप – रस – गन्ध

 ५. पंच इन्द्रिय बुद्धि- शब्द ज्ञान – स्पर्श ज्ञान – रूप ज्ञान – रस ज्ञान – गन्ध ज्ञान

•  पंच ज्ञानेन्द्रियों का वर्णन

 श्रोत्र( Ears )  स्पर्शन( Skin )चक्षु  ( Eyes ) रसना ( Tongue )घ्राण( Nose )

 ( १ ) श्रोत्र – कर्ण ( Ear )

पर्याय- कान , कर्ण , श्रुति , श्रवणेन्द्रिय , श्रोत्रेन्द्रिय ।

आयुर्वेदिक संहिता ग्रन्थों में निम्नानुसार कर्ण के सन्दर्भ में वर्णन मिलता है ।

 ” द्वे कर्ण शष्कुलिके , द्वौ कर्णपूत्रको । ” ( च.शा. ७/११ )

आचार्य चरक ने बाह्य प्रत्यंगों का वर्णन करते समय दो कर्ण शष्कुली ( कर्णपाली Pinna of ear , बाह्य कर्ण का फनल के आकार का चौड़ा भाग ) तथा दो कर्णपुत्रक ( Tragus ) बताये हैं ।

( २ ) स्पर्शन – त्वचा (Skin)

परिभाषा- सम्पूर्ण शरीर के अंग – प्रत्यंगों को बाहर से आवृत ( ढकने ) करने वाला एवं शरीर में सर्वप्रथम दिखाई देने वाला अंग त्वचा है ।

( ३ ) चक्षु – अक्षि ( Eye )

• पर्याय- अक्षि , चक्षु , दृष्टि , चक्षुरिन्द्रय , दर्शनेन्द्रिय ।

 • नेत्रगोलक ( अक्षिगोलक- Eye – ball ) की उत्पत्ति एवं स्थिति

नेत्र गोलक गोल , गोस्तन के आकार का , पंचमहाभूतों से निर्मित अवयव है ।

इसमें

मांसल भाग – पृथ्वी से

रक्तवर्ण का भाग  – अग्नि से

• वायु से – कृष्ण भाग

• जल से – श्वेत भाग

• आकाश से – अश्रु मार्गों की उत्पत्ति होती है । .

• नेत्र में दोषों की स्थिति निम्नानुसार है

• प्राणवायु- रूप के ज्ञान को वहन करती है ।

• व्यान वायु -गति या हलचल करती है ।

• आलोचक पित्त- रूप का ग्रहण करता है ।

 • तर्पक कफ -नेत्र को प्रसन्न , स्वस्थ एवं गीला रखता है ।

( ४ ) रसना – जिह्वा ( Tongue )

 पर्याय- रसना , जिह्वा , जिहिका , गोजिह्वा , वागिन्द्रिय , रसनेन्द्रिय ।

 परिचय- यह मुखगुहा ( Mouth cavity ) में स्थित है । इसका पश्चिम सिरा ( Posterior end ) कंठिका अस्थि ( Hyoid bone ) से सम्बद्ध तथा स्थिर रहता है । पूर्व सिरा ( Anterior end ) खुला ( Open ) है और चल होता है • जिह्वा मांस निर्मित प्रत्यंग है ।

• चारों ओर से यह श्लेष्मल कला से आच्छादित है ।

उत्पत्ति- “ कफशोणित मांसानां सारो जिह्वा प्रजायते । ” ( सु.शा. ४/२७ ) कफ , रक्त , मांस सार भाग से जिह्वा की उत्पत्ति होती है ।

( ५ ). घ्राण – नासा ( Nose )

 पर्याय- नासा , घ्राण , नासिका , गन्धेन्द्रिय , घ्राणेन्द्रिय ।

 “ नासा घ्राणेन्द्रिय स्थानम् । ” नासा घ्राणेन्द्रिय का स्थान है । नासा शिर का द्वार है ।

• शिरोरोगों में नस्य से औषधि दी जाती है । नासा में तीन अस्थियाँ होती हैं

 “ घ्राण गन्धास्थिपार्थिवम् । “

घ्राण , गन्ध एवं अस्थि पृथ्वी तत्व से बने हैं ।

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