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Hingvashtak Churna

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• हिंग्वष्टक चूर्ण ,अविपत्तिकर चूर्ण तथा हिंगु शोधन

हिंग्वष्टक चूर्ण :

“त्रिकटुकमजमोदा सैन्धवं जीरके द्वे ,

समधरणधृतानामष्टमो हिङ्गुभागः ।

प्रथमकवलभुक्तं सर्पिषश्चूर्णमेत

ज्जनयति जठराग्निं वातरोगांच हन्ति ।।” ( भै . र . अग्निमांद्य -59 )

घटक द्रव्य :

1. शुण्ठी 1 भाग

2. मरिच 1 भाग

3. पिप्पली 1 भाग

4. अजमोदा 1 भाग

5. सैन्धवलवण 1 भाग

6. श्वेतजीरक 1 भाग

7. कृष्णजीरक 1 भाग

8. शुद्ध हींग 1 भाग

निर्माण विधि : – उपरोक्त सभी द्रव्यों का पृथक् – पृथक् सूक्ष्म चूर्ण करें । फिर सभी को अच्छी तरह मिलाकर काँच के जार में सुरक्षित रखें ।

मात्रा : -1 से 4 ग्राम अनुपान एवं प्रयोग काल : – प्रथम ग्रास में घृत के साथ । इसके अतिरिक्त उष्ण जल , तक्र आदि से भी प्रयोग किया जा सकता है ।

उपयोग : – जठराग्निप्रदीपक , वातरोगनाशक , प्रवाहिका , गुल्म , उदावर्त , आनाह , अग्निमांद्य , उदरशूल , अरुचि , वातगुल्म आदि रोगों का नाश करता है ।

• हिंगु शोधन :

“रामठं समशुद्धाज्यसंयुतं दर्विकागतम् ।

विपक्वमग्नितापेन शुद्धियात्यानुत्तमाम् ।।” ( र . त . 24/578 )

घटक द्रव्य :

1. हिंगु ( नि . ) – 1 भाग

2. गोघृत – यथावश्यक

• विधि

हिंगु को घी के साथ एक कढ़ाही में डालकर तक तक भर्जन किया जात है , जब तक वह भुरभुरा नहीं हो जाता ।

• मुख्य उपयोग : – अग्निमांद्य , विबन्ध , आध्माननाशक है । प्रमुख योग -हिंग्वष्टक चूर्ण , रजः प्रवर्तिनी वटी ।

• अविपत्तिकर चूर्ण

घटक द्रव्यः

1. शुण्ठी 1 भाग

2. मरिच 1 भाग

3. पिप्पली 1 भाग

4. हरीतकी 1 भाग

5. बिभीतकी  1 भाग

6. आमलकी – 1 भाग

7. नागरमोथा – 1 भाग

8. विड लवण 1 भाग

9. विडङ्ग 1 भाग

10. सूक्ष्मैला 1 भाग

11. तेजपत्र 1 भाग

12. लवङ्ग 11 भाग 

13. त्रिवृत मूल 44 भाग      

14. शर्करा 66 भाग

• निर्माण विधि

सर्वप्रथम सभी द्रव्यों को पृथक् – पृथक् इमामदस्ते में कूटपीसकर सूक्ष्म चूर्ण का निर्माण करें । फिर सभी द्रव्यों के चूर्णों को अच्छी तरह मिलाकर काँच के जार में सुरक्षित रखें ।

मात्रा : -3-6 ग्राम अनुपान : -मधु , जल , दुग्ध मुख्य

उपयोग :- अम्लपित्त , अग्निमान्द्य , विबन्ध , अर्श ।

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