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HIM KALPANA

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हिम कल्पना

• परिभाषा :

“क्षुण्णं द्रव्यपलं सम्यक् षड्भिर्नीरपलै : प्लुतम् ।

 निशोषितं हिमः स स्यात् तथा शीतकषायकः ।।” ( शा . सं . म . ख . 4/1 )

अर्थात् 1 पल द्रव्य को भली – भांति कूट पीसकर 6 पल जल में रात्रिभर भिगोकर प्रातःकाल मसलकर छान लेने से हिम ( शीतकषाय ) कल्पना बनती है ।

औषध द्रव्य को कूटकर गरम जल में रात्रिभर भिगोकर प्रातःकाल मसलकर छान लेने से शीत कल्पना बनती है ।

• मात्रा

हिम कल्पना की मात्रा फाण्ट के समान 2 पल ( 96 मि.ली. ) मानी है ।

आचार्य यादवजी त्रिकमजी के अनुसार हिम की मात्रा एक पल है ।

• प्रक्षेपद्रव्य की मात्रा : –

हिम में प्रक्षेप द्रव्य की मात्रा क्वाथ एवं फाण्ट समान ही डालनी चाहिए ।

• धान्यक हिम :

” प्रातः सशर्करः पेयो हिमोधान्यकसम्भवः ।

अन्तर्दाहं तथा तृष्णां जयेत् स्रोतोविशोधनः ।।” ( शा . सं . म . ख . 4/7 )

अर्थात् धान्यक हिम शर्करा के साथ मिलाकर प्रातःकाल पीने से अन्तर्दाह एवं तृष्णा का शमन करता है तथा स्रोतो का शोधन करता है ।

• सारिवादि हिमः

1. सारिवा , 2. वृहद् सारिवा ( उशबा ) 3. चोपचीनी , 4. मंजिष्ठा , 5 . गुडूची , 6. यवासा , 7. रक्तचन्दन , 8. गुलबनप्सा , 9. उशीर , 10. मुण्डी , 11 . चिरायता , 12. कमलपुष्प , 13. गुलाबपुष्प , 14. द्रोणपुष्पी 15. पद्मकाष्ठ 16. शंखपुष्पी प्रत्येक द्रव्य 3-3 ग्राम ( कुल 48 ग्राम ) के यवकुट चूर्ण को 6 पल जल में रात्रिभर भिगोकर सुबह मसलकर छान लें । यह सारिवादि हिम है । ( सि . यो . सं . 21 / पृ .118 )

• मात्रा : 2 पल

• अनुपान : – शर्करा

•प्रयोग : – रक्तविकार , पित्तजव्याधि , पाण्डु , कण्डु , हस्तपाददाह , अम्लपित्त , पुराणज्वर । 

• पित्तप्रमाथि हिम :

अर्थात् सनाय का चूर्ण -12 ग्राम , पिण्डखजूर -16 नग तथा मंजिष्ठा चूर्ण 4 ग्राम को मिलाकर 250 ग्राम जल में भिगोकर सायंकाल छत पर रख दें । प्रातःकाल पानी को हिलाये बिना नितार ले ।

इसमें 60 ग्राम शर्करा भी मिला सकते हैं । यह जल रोगी को पिलाने से मल एवं मूत्र का रेचन होकर स्वास्थ्य लाभ होता है । यह प्रयोग पाण्डु , रक्तपित्त , कण्डू तथा ज्वर आदि रोगों का प्रशामक है । यह हिम कामला ( Jaundice ) रोग में अत्यधिक लाभदायक है ।

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