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HETU KA SVAROOP

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हेतु का स्वरूप

सामान्य भाषा में हेतु को कारण ‘ कहते हैं ।
साध्य को ज्ञापित करने वाले को हेतु कहा जाता है ।

•हेतु तीन प्रकार का होता है
1 ) केवलान्वयी
2 ) केवलव्यतिरेकी और
3 ) अन्वयव्यतिरेकी ।

1 ) केवलान्वयी :- जहां हेतु में केवल अन्वयव्याप्ति रहे , वहां केवलान्वयी हेतु होता है अर्थात् केवलान्वयी वहां होता है जहां सभी प्रकार की वस्तु साध्य हो , जो सत्ता मात्र में रहती हो । केवलान्वयी में – ” यदि ऐसा है तो भी होगा ‘ ‘ यह भाव रहता है । उदाहरण- जैसे जहाँ धूम है वहाँ अग्नि भी होगी ।

2 ) केवलव्यतिरेकी : – जिस अनुमान में व्यतिरेक व्याप्ति ही हो एवं यहां अन्वयव्याप्ति नहीं होती इसलिए केवल व्यतिरेकी कहा जाता है । केवलव्यतिरेकी में यह भाव रहता है – ” ऐसा नहीं तो ऐसा भी नहीं । जहाँ अग्नि नहीं वहाँ धूम भी नहीं ।

3 ) अन्वयव्यतिरेकी : – जहाँ अन्वय और व्यतिरेक दोनों व्याप्तियों द्वारा वस्तु का ज्ञान कराया जाए वहाँ अन्वय व्यतिरेकी हेतु कहलाता है ।

• हेत्वाभास

परिभाषा – हेत्वाभास अर्थात हेतु का आभास होना ।

हेत्वाभास वह हैं जो हेतु जैसे प्रतीत होते हैं परन्तु हेतु नहीं होते ।

हेत्वाभास का लक्ष्ण – ‘ अहेतवो हेत्वाभासा : ‘ । अर्थात् जो हेतु न हो किन्तु हेतु के समान प्रतीत हो उसे हेत्वाभास कहते है ।

हेत्वाभास के भेद – हेत्वाभास पांच प्रकार के होते हैं –
1 ) सव्यभिचार
2 ) विरूद्ध
3 ) सत्प्रतिपक्ष
4 ) असिद्ध
5 ) बाधित

1 ) सव्यभिचार- जो हेतु साध्य के साथ भी रहे और उससे अलग भी पाया जाए उसे सव्यभिचार कहते हैं । अर्थात् यह कहा जाए कि चॉक होने से चॉक में सफेदी है किन्तु यह सफेद रूप तो अन्य जगह भी पाया जाता है अत : हेतु में व्यभिचार है ।

2 ) विरूद्ध – जिस हेतु के साथ उसके साध्य का अभाव हो वह हेतु विरुद्ध कहलाता है । जैसे शब्द नित्य है क्योकि उत्पन्न होता है । वास्तव में जो – जो उत्पन्न होता है वह सब अनित्य होता है । फिर उत्पन्न होने वाला शब्द नित्य कैसे हुआ ? कार्य रूप में सभी पदार्थ अनित्य होते हैं इसलिए शब्द को भी अनित्य कहा गया । लेकिन कारण रूप से नित्य है , इसलिए यह हेतु शब्द के प्रति विरुद्ध है ।

3 ) सत्प्रतिपक्ष- जिस हेतु के साध्य के अभाव को सिद्ध करने वाला कोई अन्य हेतु हो उसके सत्प्रतिपक्ष कहते हैं अर्थात् जिसका विरोधी अनुमान हो सके । जैसे – धूम होने के कारण पर्वत पर अग्नि है , यह प्रमाण दिए जाने पर यह कहा जाए कि यह रसोईघर तो नहीं है अत : पहाड़ पर अग्नि नहीं हो सकती । ऐसी जगह पहला अनुमान दूसरे अनुमान के द्वारा बाधित है ।

4 ) असिद्ध- – जब साध्य को सिद्ध करने के लिए इस प्रकार के हेतु का प्रयोग किया जाए जो स्वयं सिद्ध न हो , उसे असिद्ध हेत्वाभास कहते हैं ।

यह तीन प्रकार का होता है –
1.आश्रयासिद्ध
2.स्वरूपासिद्ध
3 . व्याप्यत्वासिद्ध

  1. आश्रयासिद्ध- जिसका आश्रय या आधार न हो उसे आश्रयासिद्ध कहते हैं । जैसे जल में उत्पन्न होने वाला कमल जिस प्रकार सुगन्धित होता है उसी प्रकार आकाश में उत्पन्न होने वाला कमल भी सुगन्धित होता है । इसमें आकाश को कमल का आश्रय माना गया है लेकिन जो स्वयं ही शून्य है वह किसी का आश्रय नहीं हो सकता । अत : आधार से असिद्ध हो गया ।
  2. स्वरूपासिद्ध – जिस अनुमान के हेतु पक्ष में न रहे उस हेतु को स्वरूपासिद्ध कहते हैं । जैसे शब्द गुण है क्योंकि वह आखो से दिखाई देता है । यहां पर शब्द को आंखों से दिखाई देने वाला बताया गया है लेकिन ऐसा नहीं होता क्योंकि शब्द कान से सुनाई देता है न कि आखों से दिखाई देता है । अतः स्वरूप के कारण असिद्ध हो गया ।

3 . व्याप्यत्वासिद्ध- जिस हेतु में कोई उपाधि रहे वह सोपाधिक है । सोपाधिक वस्तु को व्याप्यत्वासिद्ध कहते हैं । जो साध्य का व्यापक हो परन्तु साधन का व्यापक न हो उसे उपाधि कहते हैं ।
जैसे पर्वत पर धूम है क्योंकि वहां अग्नि है । यहां गीले ईधन का संयोग है । अत : जहां धूम है वहां गीले ईधन का संयोग अवश्य है । यह साध्य व्यापकता है । लेकिन गर्म लोहे के गोले में धूम नहीं निकलता अत : जहां अग्नि होगी वहां धूम होगा यह व्याप्यत्वासिद्ध है ।

  1. बाधित – जिस हेत्वाभास के साध्य का अभाव दूसरे प्रमाण से निश्चित रूप से सिद्ध हो उसे बाधित हेत्वाभास कहते हैं । जैसे यदि कहा जाए आग गर्म नहीं है क्योंकि यह द्रव्य नहीं है । यहां गर्म न होना साध्य है और गर्म या ठण्डा प्रत्यक्ष स्पर्श का विषय है ।

तर्क – कोई पदार्थ सामान्यता ज्ञात होने पर भी विशेष रूप से ज्ञात नहीं हो तो हेतु के उपपादन द्वारा उस पदार्थ के तत्त्वज्ञान के लिए जो सम्भावना की जाती है वह तर्क कहलाता है । यथा जहां अग्नि का अभाव होता है वहां धूम का भी तो अभाव होता है इस प्रकार कहा जाना तर्क कहलाता है ।

तर्क का महत्त्व –
इसके तीन महत्व वर्णित है –
१ . उद्देश्य- वस्तु का नाम बताना ,
२. लक्षण- वस्तु का साधारण धर्म बताना और
३. परीक्षा- वर्णित वस्तु का लक्षण सही है या गलत इस पर विचार करने की प्रक्रिया परीक्षा है

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