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GUN VIGYANIYA

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गुण – विज्ञानीय

‘ गुण ‘ ‘ वह है जो द्रव्य में ‘ समवाय सम्बन्ध ‘ से हो , चेष्टारहित हो , स्वयं भी चेष्टा ( क्रिया , कर्म ) रूप न हो और किसी गुण की उत्पत्ति में कारणभूत हो ।

गुणों की संख्या –

चरक संहिता के अनेक स्थलों पर ‘ गुण ‘ का वर्णन आया है . च . सू . स्थान के प्रथम अध्याय में इसे कुल ४१ प्रकार का माना गया है , जिसे ४ भागों में वर्गीकृत किया गया है –

१. सार्था ( अर्थ गुण ) या इन्द्रिय गुण या वैशेषिक गुण –
ये 5 हैं –
१ . शब्द ,
२. स्पर्श ,
३. रूप ,
४. रस और
५. गन्ध ।
ये पांचों आकाशादि पांच महाभूतों के प्रधान गुण होने के कारण वैशेषिक गुण कहे जाते है । ये ही श्रोत्रादि इन्द्रियों के अर्थ है , जैसे —
1.आकाश महाभूत का प्रधान गुण शब्द और इन्द्रिय – श्रोत्रेन्द्रिय ( कणेन्द्रिय ) है ,
2.वायु महाभूत का प्रधान गुण स्पर्श और इन्द्रिय – स्पर्शनेन्द्रिय है ,

  1. आग्नि का प्रधान गुण रूप और इन्द्रिय चक्षुरेन्द्रिय है ,
  2. जल का प्रधान गुण रस इन्द्रिय – रसनेन्द्रिय है , और
  3. पृथ्वी का प्रधान गुण गन्ध , इन्द्रिय – घ्राणेन्द्रिय है ।

२. गुर्वादय गुण –
ये संख्या में २० होते हैं -१ . गुरु , २. लघु . ३. शीत , ४ . उष्ण , ५. स्निग्ध , ६. रूक्ष , ७. मन्द , ८. तीक्ष्ण , ९ . स्थिर , १०. सर , ११. मृदु , १२ . कठिन , १३. विशद , १४. पिच्छिल , १५. श्लक्ष्ण , १६. खर , १७. सूक्ष्म , १८. स्थूल , १ ९ . सान्द्र एवं २०. द्रव ।
कविराज गंगाधर राय ने इन्हें शारीर गुण कहा हैं । ये गुण पृथिव्यादि पंचमहाभूतों में सामान्यतया रहते हैं , अत : इन्हें सामान्य या द्रव्य गुण भी कहते हैं ।

३. ” बुद्धि आदि ‘ प्रयत्न ‘ पर्यन्त ६ ‘ आत्म ‘ या ‘ आध्यात्म ‘ गुण है –
१. बुद्धि , २. इच्छा , ३. द्वेष , ४. सुख , ५. दुःख और ६. प्रयत्न ।

४. परादयः या परादि गुण या सामान्य गुण
-द्रव्य के सम्बन्ध में कहे गये ये १० गुण हैं ।
१. परत्व , २. अपरत्व , ३. युक्ति , ४. संख्या , ५. संयोग , ६. विभाग , ७ . पृथक्त्व , ८. परिमाण , ९ . संस्कार एवं १०. अभ्यास ।

गुर्वादय गुण तथा परादि गुण दोनों ही सामान्य गुण होते हैं इस प्रकार सामान्य गुण की संख्या 30 है।

इस प्रकार कुल ४१ गुणों का चरक ने वर्णन किया है ।

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