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AYURVEDA KA ITIHAS PART -3

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आयुर्वेद का इतिहास

Globalization of Ayurveda

भारत के साथ प्राचीनकाल से वर्तमान काल तक व्यापारिक सम्बन्धों की पुष्टि एवं आयुर्वेद के विकास का ज्ञान प्राप्त होता है । विभिन्न देशों के साथ भारत के सम्बन्ध में आगे विचार किया जा रहा है ।

नेपाल – पूर्व में यह भी भारत का ही भाग था जो पृथक हो गया । यहां परम्परागत सनातन संस्कृति होने से आयुर्वेद का भी प्रचार – प्रसार प्रारम्भ से ही रहा है ।

यह देश पूर्ण हिन्दु राष्ट्र के नाम से जाना जाता रहा है । वर्तमान में प्रजातन्त्र सरकार के चलते महाराजा के अधिकार समाप्त कर मिलीजुली सरकार प्रारम्भ होने पर अब देश का क्या स्वरूप रहेगा , भविष्य बताएगा । दरबार सिंह का वैद्यखाना सर्व प्राचीन है । नरदेवी मन्दिर काठमाण्डु में शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय चलता आ रहा है ।

प्रारम्भ में यह विद्यालय निखिल भारत वर्षीय आयुर्वेद विद्यापीठ से सम्बद्ध था । यहां विद्यालय की स्थापना सम्वत 1905 में हुई थी । राज गुरू पं 0 हेमराज जी यहां के प्रधान बनाये गये । पं 0 हेमराज जी शर्मा ने महाराजा के पोथी खाने में संग्रहित अनेकों आयुर्वेद ग्रन्थों का अनुवाद एवं प्रकाशन करवाया । काश्यप संहिता के ताड़पत्रों को उतार कर प्रकाशन ही नहीं कराया अपितु इसकी शोध पूर्ण भूमिका भी लिखी जो आयुर्वेद इतिहास के लिए शोध पूर्ण कार्य है।

मिस्त्र में भी भारत का प्राचीन सम्बन्ध रहा है । प्राचीन व्यापारियों के माध्यम से भारतीय माल मिस्त्र जाता रहा । अनेक भारतीय व्यापारी भी वहां पहुंच कर बस गए थे । उनकी बस्ती का नाम इण्डिया हो गया था ।

भारत से मिस्त्र पहुंचने वाली वस्तुओं में हाथीदांत , सोना , रत्न , चन्दन , मोर और बन्दर प्रमुख थे । किसी विद्वान् के अनुसार मिस्त्री पुरोहित कपड़े नील में रंगते थे और शवों को भारतीय मखमल में लपेटते थे । पेपरिस में दालचीनी , पीपल और सौठं का उल्लेख है । जो सम्भवत : भारत से वहां निर्यात होते थे।

श्रीलंका : – इसे सिंहल द्वीप या रत्न द्वीप भी कहा जाता है । सम्राट अशोक ने यहां बौद्ध धर्म प्रचार के लिए अपने पुत्र व पुत्री को भेजा था ।
अशोक स्वयं आयुर्वेद का पोषक था उसने अनेकों स्तम्भ लेखों में एवं धर्म प्रचार से स्वास्थ्य एवं चिकित्सा को भी साथ रखा । पूर्व में भी वहां सुशेण वैद्य का उल्लेख आता है तथा रावण स्वयं आयुर्वेद ज्ञाता थे ।
अत : वहां भी चिकित्सा आयुर्वेद ही रही है । गुप्त काल में आयुर्वेद प्रचार प्रसार में बुद्वदास का नाम विशेष रूप से किया जाता है । यह बुद्ध धर्मानुयायी थे स्वयं अच्छे चिकित्सक भी थे ।
अपने साथ भैषज पेटिका भी रखते थे , इन्होनें पशु चिकित्सा की व्यवस्था की थी तथा अनेक स्थानों पर औषधालय खुलवाये ।

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