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GARBHA VRIDHIKAR BHAV

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गर्भ वृद्धिकर भाव

” तत्र गर्भस्य पितृज – मातृज – रसज – आत्मज – सत्वज – सात्म्यजानि शरीर लक्षणानि । ” ( सु.शा. ३/३१ )

गर्भ उत्पन्न होते समय उसमें पितृज , मातृज , रसज , आत्मज , सत्वज और सात्म्यज भाव सम्मिलित होकर इन सबके समुदाय से ही गर्भ उत्पन्न होता है । अर्थात् गर्भ वृद्धि करता है ।
अत : ये छ : भाव गर्भ की निर्मिति के लिए माने गए हैं ।

१. पितृज-

” गर्भस्य , केश – श्मनु – लोम – अस्थि – नख – दन्त – सिरा – मायु – धमनी रेत : प्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि । ” ( सु.शा. ३/३१ )

केश , श्मश्रु ( दाढ़ी – मूंछ ) , लोम , अस्थि , नख , दांत , सिरा , स्नायु , घमनी तथा शुक्र ये स्थिर और कठिन भाव पितृज होते हैं ।

२. मातृज-

” मांस – शोणित – मेदो – मज्जा – हनाभि – यकृत – प्लीहात्र – गुद प्रभृतीनि मृदूनि मातृजानि । ” ( सु.शा. ३/३१ )

मांस , रक्त , मेद , मज्जा , हृदय , नाभि , यकृत , प्लीहा , आंत्र , गुद तथा अन्य जो मृदु भाव शरीर में पाये जाते हैं , वे मातृज कहलाते हैं ।

३. रसज-

” शरीरोपचयो बलं वर्णः स्थिति निश्च रसजानि । ” ( सु.शा .३ / ३१ )

शरीर के धातुओं की वृद्धि , बल , वर्ण , स्थिति तथा क्षय ये सब भाव आहार रस द्वारा प्राप्त होते हैं ।

४. आत्मज-

” इन्द्रियाणि ज्ञानं विज्ञानमायुः सुखं दुःखादिकं चात्मजानि । ” ( सु.शा. ३/३१ )

इन्द्रियाँ , ज्ञान , विज्ञान , आयु , सुख तथा दुःख ऐसे सब भाव आत्मा से प्राप्त होते हैं ।

५. सत्वज-

” शौचमास्तिक्यमभ्यासो वेदेषु गुरूपूजनम् । ” ( सु.शा .४ / ८० )

सत्व अर्थात् मन । मन सदैव सत्व गुण से ही प्रेरित रहता है । रजो या तमो गुण का आधिक्य होने पर उसी सात्विक मन में विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं । अत : सात्विक मन द्वारा सत्व गुणों के लक्षण स्वरूप निम्न भाव प्राप्त होते हैं –

पवित्रता , ईश्वर में आसक्ति , वेदों में रूचि तथा उनका अध्ययन करने की प्रवृत्ति होना , गुरू , आचार्य , वृद्ध , विद्वान इनके प्रति आदर ये सब भाव प्राप्त होते हैं ।

६. सात्म्यज-

” वीर्यमारोग्यं बलवर्णी मेधा च सात्म्यजानि । ” ( सु.शा. ३/३१ )

वीर्य ( तेज , शक्ति , ओज ) , आरोग्य , बल , वर्ण तथा मेधा ये भाव , प्रतिदिन ग्रहण किया जाने वाला उपयुक्त आहार – विहार तथा सतत् अभ्यास द्वारा प्राप्त किये जाते हैं ।

इस प्रकार गर्भ की उत्पत्ति में या गर्भ की वृद्धि में उपर्युक्त विभिन्न भावों का योगदान रहता है । इसी से इन भावों को गर्भ वृद्धिकर भाव कहते हैं

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