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GARBHA KAI MASANUMASIKI VRIDHI

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गर्भ की मासानुमासिकी वृद्धि

१. ” तत्र प्रथमे मासि कललं जायते । ” ( सु.शा. ३/१५ )

शुक्र और शोणित के संयोग होने से प्रथम मास में गर्भ का स्वरूप कलल ( बुबुदाकार ) होता है ।

२. ” द्वितीये शीतोष्मानिलैरशिप्रपच्यमानानां महाभूतानां संघातो घन : सञ्जायते ; यदि पिण्डः पुमान् , स्त्री चेत् पेशी , नपुंसकं चेदर्बुदमिति । ” ( सु.शा. ३/१५ )

दूसरे महिने में शीत ( श्लेष्मा ) , ऊष्मा ( पित्त ) और अनिल ( वायु ) से परिपक्व महाभूतों के संघात से गर्भ घन बन जाता है ।
यदि वह गर्भ पिण्डाकृति ( गोल ) का हो तो पुत्र उत्पन्न होता है , यदि पेशी हो तो कन्या और अर्बुद ( Tumour ) हो तो नपुंसक होता है ।

३. ” तृतीये हस्तपादशिरसां पञ्च पिंडका निवर्तन्ते , अङ्गप्रत्यङ्गविभागश्च सूक्ष्मो भवति । ” ( सु.शा. ३/१५ )

तीसरे महिने में दो हाथ , दो पैर और सिर इनकी पांच पिण्डकाएं निकल आती हैं । और अंग – प्रत्यंग विभाग सूक्ष्म होता है ।

४. ” चतुर्थे सर्वाङ्ग प्रत्यङ्ग विभागः प्रव्यक्तो भवति , द्विहृदयां च नारौं दौहदिनीमाचक्षते । ” ( सु.शा. ३/१५ )

चौथे महिने में सम्पूर्ण अंग – प्रत्यंग विभाग पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट हो जाते है । और गर्भ का हृदय स्पष्ट होने से चेतना धातु व्यक्त होती है । दो हृदय होने से गर्भिणी स्त्री को दौहदिनी कहते हैं ।

५. ” पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धतरं भवति । ” ( सु.शा. ३/२८ )

पाँचवें महिने में मन अधिक प्रबुद्ध एवं सचेत होता है ।

६. “ षष्ठे बुद्धिः । ” ( सु.शा. ३/२८ )

छठे महिने में बुद्धि अधिक प्रव्यक्त हो जाती है ।

७. ” सप्तमे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरः । ” ( सु.शा. ३/२८ )

सातवें महिने में सम्पूर्ण अंगों और प्रत्यंगों का विभाग अधिक स्पष्ट हो जाता है । इस महिने में पैदा हुआ बालक जीवित रह सकता है ।

८. ” अष्टमेऽस्थिरी भवत्योजः । ” ( सु.शा. ३/२८ )

आठवें महिने में ओज अस्थिर ( चंचल ) होता है । इस महिने में बालक पैदा होने पर नैर्ऋत के भाग के कारण तथा ओज धातु अस्थिर रहने से बालक जीवित नहीं रहता । इस कारण नैर्ऋत को मांस और भात ( चावल ) की बलि देनी चाहिए ।

९ . ” नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतमस्मिन् जायते , अतोऽन्यथा विकारी भवति ” ( सु.शा. ३/२८ )

नौवें , दसवें , ग्यारहवें और बारहवें में से किसी भी महिने में गर्भ का स्वाभाविक प्रसव होता है । इसके बाद यदि प्रसव हो तो वह विकारी गर्भ समझा जाता है ।

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