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Fundamental principles of bhaishajya kalpana

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भैषज्य कल्पना के आधारभूत सिद्धान्त ( Fundamental principles of bhaishajya kalpana )

• औषध निर्माण के लिए प्राचीन आचार्यों ने कुछ सिद्धान्तों का निरूपण किया है । जिनको भैषज्य कल्पना के आधारभूत सिद्धान्त कहा जाता है।

1. परिभाषा एवं मान

2. अनुक्त या विशेषोक्त ग्रहण

3. औषधि द्रव्य की विशिष्टता

4. पञ्चविध कषाय कल्पना

5. द्रव्य स्थिति रस , गुण , वीर्य , विपाक तथा प्रभाव

6. संस्कार ( गुणान्तराधान )

7.  औषध योगों का नामकरण

1. परिभाषा एवं मान –  परिभाषा के द्वारा वाक्यों का संक्षिप्त ज्ञान हो जाता है तथा मान के  बिना कोई भी युक्ति संभव नहीं है वह सब द्रव्यों का प्रयोग भी मान के बिना निष्फल ही होता है।

2. अनुक्त या विशेषोक्त ग्रहण-

औषध सेवन के समय का निर्देश नहीं होने पर प्रातःकाल , द्रव्य के अङ्गविशेष का निर्देश नहीं होने पर वनस्पति की जटा , औषधनिर्माण में औषधि की मात्रा का निर्देश नहीं होने पर वहाँ पर प्रत्येक औषधि को समभाग , पात्रविशेष का निर्देश नहीं होने पर मिट्टी का पात्र , भावना आदि के लिए द्रव द्रव्य का निर्देश नहीं होने पर जल और अनुक्त तैल के स्थान पर सामान्य नियमानुसार तिल तैल का ग्रहण करना चाहिए । इसके अतिरिक्त जिन औषधि योगों में एक औषध दो बार लिखी हुई हो तो उसे दुगुनी मात्रा में लेना चाहिए ।

3. औषधि द्रव्य की विशिष्टता –

“बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविध कल्पना ।

संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते ।।”

 ( च . सू . 9/7 )

अर्थात् औषधियाँ प्रभूतमात्रा में उपलब्ध , औषधियों की रोगनाश में समर्थता , एक औषधि में अनेक प्रकार की कल्पना की योग्यता होना और औषधियों का रस , गुण आदि से युक्त होने पर ही भैषज्य निर्माण के लिए लिया जाना चाहिए ।

4. पञ्चविध कषाय कल्पना

भैषज्य कल्पना का मूल आधार स्वरस , कल्क , क्वाथ , हिम एवं फाण्ट( पंचविध कषाय कल्पना ) है ।

5. द्रव्य स्थिति रस , गुण , वीर्य , विपाक तथा प्रभाव

 द्रव्य स्थित रस गुण वीर्य विपाक और प्रभाव यह पांच ही द्रव्य में रहकर अपने अपने कार्य को करते हैं।

6. संस्कार ( गुणान्तराधान )

  औषधियों के गुणों में वृद्धि करने की प्रक्रिया उसका संस्कार कहलाती है।

7.  औषध योगों का नामकरण

 जिस औषध  योग में सर्वप्रथम जिस द्रव्य का नाम होता है वह औषध योग उसी द्रव्य के नाम से कहा जाता है ।

लेकिन अन्य आधार पर भी औषधि के योगा के नामकरण शास्त्रों में किए गए हैं ।

जैसे-

 द्रव्य अनुसार-  चित्रकादि वटी

काल अनुसार – पुष्यानुग चूर्ण

मात्रा अनुसार – क्षीरषट्पल घृत

निर्माण अनुसार – लवण भास्कर चूर्ण ।

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