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Fannit Evam Awaleh

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फाणित तथा  अवलेह ( लेह )

• फाणित

 फाणित कल्पना रसक्रिया ही होती है , जिसे लौकिक भाषा में काकवी ‘ कहा जाता है :

“रसक्रिया फाणिताकृतिः ‘ काकवी ‘ इति लोके । “( सु . सू . 37/20 की डल्हण टीका )

इक्षु का रस पकाने पर जब कुछ गाढ़ा तथा अधिक पतला स्वरूप का बन जाता है , तो उसे फााणित राब कहते हैं । डल्हण ने इसे क्षुद्रगुड कहा है ।

• निर्माण विधि : –

इक्षुरस को स्वच्छ वस्त्र से छानकर , मन्दाग्नि से पाक करने पर जब इक्षुरस मधु के समान गाढ़ा हो जाय तो उसे मृत्पात्र या काँच के जार में रखें । यह फाणित है । यह इक्षुविकार अर्थात् इक्षु से निर्मित द्रव्य है । फाणित को कड़छुल से ऊपर उठाया जाता है तो वह तार की तरह बँधका नहीं उठता है । जब अधिक देर तक गाढ़ा करके कड़छुल से उठाने पर तार के समान बाँधकर उठता है , वह अवलेह कहलाता है ।

अतः क्वाथ की उत्तरावस्था तथा अवलेह की पूर्वावस्था फाणित कहलाती है ।

• गुण : –

सुश्रुत संहिता में फाणित को गुरु , मधुर , अभिष्यन्दी , बृंहण , अवृष्य और त्रिदोषकारक बताया है ।

• अवलेह ( लेह )

‘ लिह आस्वादने ‘ धातु से लेह बना है , जिसका अर्थ है ऐसा भोजन पदार्थ जिसे चाट कर खाया जाये । औषध द्रव्य के क्वाथ , स्वरस आदि को और भी पकाने पर जब गाढ़ा चाटने योग्य हो जाये तो उसे अवलेह कहते हैं ।

• अवलेह दो प्रकार को बनाया जाता है :

1. प्रथम प्रकार : -स्वरस या क्वाथादि को अग्नि पर पुनः पकाकर गाढ़ा कर लिया जाता है और बाद में उसमें चूर्णादि का प्रक्षेप मिलाकर अवलेह तैयार कर लिया जाता है । इसमें शर्करा , गुडादि पदार्थ मिलाना आवश्यक नहीं है । इस विधि से निर्मित अवलेह शीघ्र विकृत हो जाता है । यथा :- कुटजावलेह ।

2. द्वितीय प्रकार : – स्वरस या क्वाथादि में शर्करा , गुड , मिश्री आदि मिलाकर अग्नि पर पाक करते हैं और 2 तार की चाशनी तैयार हो जाने पर चूल्हे से नीचे उतारकर चूर्णादि का प्रक्षेप मिलाकर तैयार कर लिया जाता है । इनमें पाक के समय किसी – किसी में गोघृत भी प्रयुक्त होता है । यथाः – वासावलेह ।

• प्रक्षेप मात्रा :

“सिता चतुर्गुणा कार्या चूर्णाश्च द्विगुणो गुडः ।

 द्रवं चतुर्गुणं दद्यादिति सर्वत्र निश्चयः ।। “( शा . सं . म . ख . 8/2 )

अर्थात् जिस चूर्ण का अवलेह बनाना हो उससे शर्करा चार गुना , गुड दो गुना तथा द्रव चतुर्गुण डालना चाहिए ।

• अवलेह की मात्रा : –

आचार्य शार्ङ्गधर ने अवलेह की मात्रा 1 पल ( 48 ग्राम ) बताई है।

• अनुपान :-

अवलेह का प्रयोग दुग्ध , इक्षुरस , यूष , पञ्चास कषाय , वासाक्वाथ तथा रोगानुसार योग्य अनुपान से करना चाहिए।

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