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DVIVIDHOPKRAMNIYA ADHYAYA

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द्विविधोपक्रमणीय

• उपक्रम ( चिकित्सा ) के भेद-

उपक्रम के दो प्रकार का होने से चिकित्सा भी दो प्रकार की मानी गयी है ।

एक संतर्पण चिकित्सा ( Nourishing Therapy ) और दूसरी अतर्पण चिकित्सा ( Ematiating Therapy ) |

विद्वानों के अनुसार ब्रहण चिकित्सा संतर्पण का और लंघन चिकित्सा अतर्पण का पर्याय हैं।

बृंहण – लंघन- बृंहण वह है जिससे शरीर में वृद्धि होती है , और लंघन वह है जिससे शरीर में लघुता ( हल्कापन ) उत्पन्न होती है ।

 प्राय : बृंहण कारक द्रव्य में गुरूता ( वृद्धि ) का गुण होने के कारण जल और पृथिवी महाभूत की अधिकता होती है जबकि लंघन कारक द्रव्य में लघुता गुण होने के कारण अग्नि – वायु और आकाश महाभूत की अधिकता होती है ।

• स्नेहन ‘ , रूक्षण , स्वेदन और स्तम्भन चिकित्सा कर्म ( बृहण और लंघन के अन्तर्गत ही आते हैं , इनमें स्नेहन और स्तम्भन बृंहण चिकित्सा और रूक्षण तथा स्वेदन लंघन चिकित्सा के अन्तर्गत आते ) हैं । सम्पूर्ण चिकित्सा ( सौम्य और आग्नेय ) दो प्रकार के ही होते हैं इससे अधिक नहीं होते ।

• लंघन चिकित्सा के भेद-

लंघन चिकित्सा शोधन और शमन भेद से दो प्रकार की होती है , जो चिकित्सा वातादि दोषों को शरीर से बाहर निकालती है उसे ‘ शोधन ‘ चिकित्सा कहते हैं , यह पाँच प्रकार की होती है – निरूह , वमन , कायविरेचन , शिरोविरेचन और रक्त मोक्षण ( अस्त्रीवस्त्रति ) ।

जो दोषों को शोधन के द्वारा बाहर नहीं निकालता है अपितु इन का उत्क्लेश ( कुपित ) किये बिना ही समान कर देता है और विषम ( क्षय या वृद्ध ) दोषों को समान कर देता है , वह ‘ शमन ‘ चिकित्सा है , यह सात प्रकार की होती है ( १ ) पाचन , ( २ ) दीपन , ( ३ ) क्षुधा , ( ४ ) तृट् ( प्यास ) , ( ५ ) व्यायाम , ( ६ ) आतप ( धूप ) सेवन और ( ७ ) मारूत् ( वात ) सेवन ।

बृंहण चिकित्सा शमन चिकित्सा ही है इसलिये वात और पित्त – वात की अवस्था में बृंहण चिकित्सा ही शमन करती है ।

• बृंहण चिकित्सा के योग्य-

व्याधि , औषध , मद्यसेवन , स्त्रीसेवन , और शोक से कृश ( दुर्बल ) हुये रोगी , भार उठाने भाराध्व 🙂 से उर : क्षत , क्षीण , रूक्ष , दुर्बल , वातज प्रकृति के , गर्भिणी , सूतिका ( शिशु के जन्मोपरान्त माता को होने वाले ज्वर ) और बालक तथा वृद्ध व्यक्ति का बृंहण करना चाहिये । ग्रीष्म ऋतु में इनके अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों का भी बृंहण करना चाहिये ।

• बृंहण कारक द्रव्य- बृंहण मांस , क्षीर , सिता ( मिश्री ) , सर्पि ( घृत ) , मधुर एवं स्निग्ध वस्ति , स्वप्न ( सोना ) , शय्या पर आराम से लेटना , अभ्यंग ( Massage- मालिश ) , स्नान करना , चिन्ता आदि से मुक्त ( निवृत्ति ) और हर्ष ( प्रसन्नता ) से बृंहण होता है ।

•  लंघन चिकित्सा के योग्य-

 मेह ( प्रमेह ) रोगी , आमदोष वाले , अतिस्निग्ध , ज्वर , उरूस्तम्भ , कुष्ठरोगी , विसर्प , विद्रधि , प्लीहा वृद्धि ( Speenomegaly ) , शिर , कण्ठ और नेत्र का रोगी तथा स्थूल रोगी का सदैव नित्य लंघन चिकित्सा करनी चाहिये और शिशिर ( माघ – फाल्गुन – आदान काल – बल श्रेष्ठ रहता है ) ऋतु में अन्य ( स्वस्थ ) व्यक्तियों का भी लंघन करना चाहिये ।

• सम्यक् बृहण और लंघन के लक्षण-

बृंहण हो जाने पर शरीर में बल और पुष्टि होती है तथा बृंहण साध्य रोग ( आमय ) नष्ट होते हैं । ठीक से लंघन होने पर इन्द्रियों में निर्मलता , मलों का निःसरण ( सगों ) , लघुता , भोजन में रूचि , भूख और प्यास की एक साथ ( सहोदय ) उत्पत्ति होती है , हृदय का उद्गार ( डकार- Belching ) और कण्ठ शुद्ध हो जाता है , रोग में मृदुता ( कमी ) का होना , उत्साह और आलस्य का नाश होता है।

• स्थूलता से कृशता श्रेष्ठ है-

स्थूलता से कृशता श्रेष्ठ ( वरं ) है , क्योंकि स्थूलता की औषध नहीं है । अतिस्थूल के लिये बृंहण या लंघन कोई भी चिकित्सा पर्याप्त ( अलं ) नहीं है क्योंकि इसके लिये मेद – अग्नि और वात को जीतने वाली औषध चाहिये ।

• कृशता – स्थूलता- मधुर – स्निग्ध द्रव्यों को तृप्ति पर्यन्त सेवन करने से और परिश्रम न करने से कृशता ( क्रशिमा ) नष्ट हो जाती है किन्तु स्थूलता ( स्थविमा ) को जीतने के लिये इसके अत्यन्त विपरीत ( तिक्त – कटु – कषाय रस की अधिकता वाले रूक्ष अन्न पान और ) औषधियों के सेवन से यह नष्ट ( निषेवणैः ) होता है।

• कृशता की चिकित्सा-

कृशता की चिकित्सा के लिए अन्न – पान और औषध सभी बृंहण गुण वाले हो । चिन्ता न करने से , प्रसन्नता से , सन्तर्पण ( पुष्टिकारक द्रव्य सेवन करने ) से और पूर्ण निद्रा ( स्वप्न ) लेने से व्यक्ति वराह ( सुअर ) के समान पुष्ट हो जाता है ।

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