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DRAVYA GUNA

द्रव्यगुण

•अष्टाङ्ग आयुर्वेद में द्रव्यगुणविज्ञान को स्थान प्राप्त नहीं है और द्रव्यगुणविज्ञान को किसी अंगविशेष तक सीमित रखने में इस शास्त्र की व्यापकता को आघात पहुँचता है इसलिए अध्ययन की सुविधा के लिए, व्यावहारिक धरातल पर लाने हेतु एवं शास्त्र की प्रगति हेतु इसे एक स्वतंत्र अंग के रूप में विस्तारित करना आवश्यक था। इस कार्य को ११वीं शती में चक्रपाणि ने द्रव्यगुणसंग्रह नामक ग्रन्थ का निर्माण कर आरम्भ किया।

•आहार एवं औषध के रूप में प्रयुक्त होने वाले सभी द्रव्यों की पहचान, गुण, कर्म एवं प्रयोग का जिस शास्त्र में विवेचन हो उसे द्रव्यगुणशास्त्र कहते हैं। द्रव्यगुणविज्ञान आयुर्वेद का मूल विषय है।

•’द्रव्यगुण’ दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘द्रव्य’ (matter) तथा ‘गुण’ (properties)। द्रव्य के अन्तर्गत जीवित और निर्जीव दोनो वस्तुएँ आ जाती हैं।

•निघण्टु (द्रव्यगुणशास्त्र) के बिना वैद्य, व्याकरण के बिना विद्वान, तथा अभ्यास के बिना धानुष्क – ये तीनों ही समानरूप से हास्य (उपहास) के पात्र होते हैं।

•द्रव्यगुण शास्त्र को दो भागों में विभाजित किया है

 

 

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