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द्रव्यगुण

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द्रव्यगुण

  1. द्रव्यगुण शास्त्र परिभाषा
द्रव्याणां गुणकर्माणि प्रयोगा विविधास्तथा ।
सर्वशो यत्र वर्ण्यन्ते शास्त्रं द्रव्यगुणं हि तत् ।।

द्रव्यों गुण , कर्म और प्रयोग का जि शास्त्र में विवेचन हो उसे द्रव्य गुण शास्त्र कहते हैं।

षड्पदार्थ सिद्धांत
सामान्य , विशेष , गुण ,द्रव्य, कर्म , समवाय

पंचमहाभूत सिद्धांत
आकाश, वायु, अग्नि , जल , पृथ्वी ये पंचमहाभूत है इनमें कर्मशः शब्द ,स्पर्श ,रूप ,रस तथा गंध है ।

षड् रस सिद्धांत
मधुर, अम्ल ,लवण ,कटु ,तिक्त ,कषाय यह 6 रस बताए गए हैं।
रस इंद्रियों के विषय को रस कहते हैं अर्थात जिस गुण का रचना के द्वारा ग्रहण होता है वह रस कहलाता है।

रस आदि पंच पदार्थ सिद्धांत
रस ,गुण ,वीर्य, विपाक तथा शक्ति यह पांच पदार्थ बताए गए हैं।

द्रव्य गुण शास्त्र का महत्व

  1. आयुर्वेद की व्याख्या में
  2. त्रिसूत्र आयुर्वेद में
  3. चिकित्सा चतुष्पाद में
  4. रोग एवं रोगी परीक्षा में
  5. भिषक् के श्रेष्ठत्व में

सप्त पदार्थ सिद्धान्त

द्रव्ये रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च ।
पदार्थाः पञ्च तिष्ठन्ति स्वं स्वं कुर्वन्ति कर्म च ।।
(भा.प्र . पू मिश्रवर्ग 6.181)
1.द्रव्य
2.रस
3.गुण

  1. वीर्य
  2. विपाक
  3. शक्ति या प्रभाव
  4. कर्म
    ये सप्त पदार्थ बतलाए गए हैं।
  5. द्रव्य- जिसमें गुण और कर्म समवायी रूप से हो वह द्रव्य है।
  6. रस – रसेद्रियों से जिस वस्तु का ग्रहण किया जाता है वह रस कहलाता है।
  7. गुण – गुण वह है जो द्रव्य में आश्रित हो, चेष्ठा रहित हो, समवाय संबंध वाला हो।
  8. वीर्य – द्रव्य के कार्य करने की शक्ति को वीर्य कहा जाता है।
  9. विपाक- पाचन क्रिया के अंत में उत्पन्न विशिष्ट रस विपाक कहलाता है।
  10. प्रभाव- जिसके कारण द्रव्य में विशिष्ट सामर्थ्य उत्पन्न होता है वह प्रभाव है।
  11. कर्म – जो किया जाए वह कर्म कहलाता है।

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