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DRAVYADRAVYA VIGYANIYA

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द्रवद्रव्यविज्ञानीय • भाग -3

•अथ इक्षुवर्गः

“इक्षोः सरो गुरुः स्निग्धो बृंहणः कफमूत्रकृत् ।।४ ।।

वृष्यः शीतोऽस्रपित्तघ्नः स्वादुपाकरसो रसः ।”

 इक्षु ( गन्ने Sugar cane के ) रस के गुण-

गन्ने का रस सर ( पतला मल लाने वाला ) , गुरु , स्निग्ध , बृंहण ( पुष्टि ) करने वाला , कफ और मूत्र को उत्पन्न करने वाला , वृष्य ( वीर्य वर्द्धक ) , शीतल , रक्तपित्तनाशक , मधुर विपाक और मधुर रस वाला होता है ।

गन्ने का अग्र ( आगे का ) भाग नमकीन और दांतों से चूसने ( पीड़ित ) पर शर्करा ( Sugar ) के समान गुणों वाला होता है ।

मूल ( Root ) में , अग्रभाग में , जन्तुओं के द्वारा खाये हुये होने पर , यंत्र ( Machine ) द्वारा पीड़ित ( निकाला ) गन्ने का रस , मैल के साथ मिला ( संकरात् ) होने पर , और थोड़ी देर तक रखे रहने पर यन्त्र से निकाला रस विकृत हो जाता है । इसलिये यह रस विदाही ( दाह- Burning उत्पन्न करने वाला ) , गुरु और विष्टम्भी ( देर से पचने वाला ) हो जाता है ।

• गन्ना पौण्डू ( पौढ़ा या सफेद ) –

गन्ना शीतल , प्रसाद ( निर्मल ) और मुधरता में श्रेष्ठ ( माधुर्यवा ) होता है । वांशिक ( नीले रंग का ) अपेक्षाकृत कुछ हीन ( अनु ) होता है । शातपर्वक ( छोटे – छोटे अनेक पर्व वाला ) , कान्तार ( जंगली ) और नेपाल आदि नाम के गन्ने क्रम से क्षारीय ( Alkaline ) , कषाय ( Astringent ) , उष्ण और कुछ विदाही ( Burning sensation ) अर्थात् दाह उत्पन्न करने वाले होते हैं ।

• फणित ( राब – गन्ने के रस को पकाकर गाढ़ा बनाना ) – गुरु , अभिष्यन्दि कारक ( कफवर्द्धक Obstructant ) , तीनों दोषों का संचय करने वाला और मूत्र का शोधक ( मूत्रल ( Diuretic ) होता है ।

संस्कारों द्वारा साफ करके बनाया गुड़ कुछ कफ कारक और मूत्र तथा मल को निकालने वाला होता है ।

 बिना साफ किया गया गुड़ अत्यधिक कृमि ( Worms ) को उत्पन्न करने वाला , मज्जा , रक्त ( असृक् ) , मेद , मांस और कफ को बढ़ाने वाला होता है ।

 पुराना गुड़ हृदय के लिये लाभकारक , और पथ्य है , नया गुड़ कफ और अग्नि को मन्द करने वाला होता है ।

• मधु ( Honey ) के गुण-

नेत्रों के लिये हितकारी , छेदि ( छेदन करने वाला अर्थात् एकत्रित कफ आदि को टुकड़े – टुकड़े में विभाजित करने वाला ) , तृष्णा ( Thirst ) , श्लेष्मा , विष ( Poison ) , हिध्मा ( हिचकी ( Hiccough ) और रक्तपित्त नाशक है । कुष्ठ ( Skin diseases ) , प्रमेह , कृमि ( worms ) , छर्दि ( वमन- vomitting ) , श्वास ( Dyspnoea ) , कास ( cough ) और अतिसार ( Diarrhoea ) को नष्ट करने वाला है ।

व्रणों ( Abscess ) का शोधन ( दूषित पूय Pus आदि को निकालने वाला ) , संधान ( जोड़ने ) करने वाला , रोपण ( Healing ) करने वाला और वात कारक होता है । यह रूक्ष , कषाय ( Astringent ) और मधुर रस वाला होता है । , मधुशर्करा भी इसी के समान गुण वाली होती है ।

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