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DRAVYADI VIGYANIYAM ADHYAY

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द्रव्यादि विज्ञानीयमध्यायं

• द्रव्य की प्रधानता- रस आदि में द्रव्य ही प्रधान होता है , क्योंकि ये रस आदि ( रस – गुण – वीर्य – विपाक – प्रभाव ) द्रव्य में आश्रित होकर रहते हैं ।

द्रव्य पञ्चमहाभूतों ( पृथ्वी – जल – अग्नि – वायु और आकाश ) से बना है और पृथ्वी ( क्ष्माम् ) का आश्रय लेकर उत्पन्न होता है ।

जल इस ( द्रव्य ) की उत्पत्ति ( योनि ) में कारण है और अग्नि – वायु तथा आकाश इसमें समवाय ( नित्य ) सम्बन्ध से हैं , इन्हीं से इसमें सम्पूर्णता और विशेषता आती है ।

• द्रव्यों का अनेक रसत्व-

भूतों ( पञ्चमहाभूतों ) के संघात ( मिलने ) से द्रव्यों की उत्पत्ति होती ( पंचमहाभूतों के मिलने से द्रव्य बनता ) है , अत : कोई भी द्रव्य एक रस वाला नहीं होता है । इसी प्रकार कोई भी रोग ( ज्वरादि ) एक दोष वाला नहीं होता है । द्रव्यों में जो स्वाद ( Taste ) व्यक्त होता है , उसे ‘ रस ‘ कहते हैं । जो स्वाद अस्पष्ट रहता है या बाद में कुछ स्पष्ट होता है या थोड़ा स्पष्ट रहता है , उनको अनुरस ‘ कहते हैं ।

• रसों में गुर्वादि गुण-

गुरु आदि गुण भी रस के आश्रय पृथ्वी आदि ( पांच भौतिक ) द्रव्यों में ही रहते हैं । रसों ( मधुरादि ) में उनका व्याप्त ( व्यपदिश्यन्ते ) रहना केवल साथ ( साहचर्य ) होने से औपचारिक ( औपचारतः ) रूप से कहा जाता है ।

• पार्थिव द्रव्यों के स्वरूप और गुण-

 जो द्रव्य गुरु ( Heavy ) , स्थूल ( Thick ) , स्थिर ( Solid ) और गन्ध गुण की अधिकता ( उल्वणता ) वाला है , वह पार्थिव होता है , और यह शरीर में भारीपन , स्थिरता , कठिनता ( संघात ) और उपचय ( पुष्टि ) करने वाला होता है ।

• जलीय ( द्रव ) द्रव्यों के स्वरूप और गुण-

 द्रव – शीतल ( Cold ) , गुरु ( Heavy ) , स्निग्ध ( चिकना – Oily ) , मन्द ( Slow ) , सान्द्र ( गाढ़ा – Semisolid ) और रस की अधिकता ( उल्बणता ) वाला होता है और यह शरीर में स्निग्धता , विष्यन्दन ( स्रोतों में साव करना ) , क्लेदन ( गीला करना ) , प्रह्लाद ( हृदय में प्रसन्नता ) और बन्धन ( आपस में बाँधना ) का कार्य करता है ।

• आग्नेय द्रव्य के स्वरूप और गुण-

रुक्ष ( Dry ) , तीक्ष्ण ( Pencterating ) , उष्ण , विशद ( स्वच्छ ) , सूक्ष्म ( Minute ) और रूप गुण की अधिकता वाले द्रव्य आग्नेय ‘ होते हैं । ये शरीर में दाह ( Burning ) , कान्ति , वर्ण ( Complexion ) , प्रकाश और पाक ( Digestion ) का कार्य करते हैं ।

•  वायव्य द्रव्य के स्वरूप और गुण-

वायु प्रधान द्रव्य रूक्ष ( Dry ) , विशद ( स्वच्छ ) , लघु ( Light ) और स्पर्श गुण की अधिकता वाले होते हैं । ये शरीर में रुक्षता ( Dryness ) , लघुता ( Lightness ) , विशदता ( स्वच्छता – Clearness ) , अनेक के विचार और ग्लानि ( Depression ) उत्पन्न करने का कार्य करते है ।

• आकाशीय द्रव्य के स्वरूप और गुण-

आकाश प्रधान द्रव्य सूक्ष्म ( Minute ) , विशद ( स्वच्छ ) , लघु और शब्द गुण की प्रधानता वाले होते हैं । इनसे शरीर में सुषिरता ( छिद्रता ) और लघुता होती है ।

• वीर्य के भेद- अनेक आचार्यों ने वीर्य ( शक्ति ) के आठ भेद माने हैं- ( १ ) गुरु ( Heavy ) , ( २ ) स्निग्ध ( Oily ) , ( ३ ) हिम ( Cold ) , ( ४ ) मृदु ( Soft ) , ( ५ ) लघु ( Light ) , ( ६ ) रूक्ष ( Dry ) , ( ७ ) उष्ण ( Hot ) और ( ८ ) तीक्ष्ण ।  

चरक का मत- चरक के अनुसार वीर्य वह है जिसके द्वारा कार्य किया जाता है । वीर्य ( शक्ति ) के बिना कोई भी कार्य नहीं किया जा सकता है , क्योंकि सभी क्रियायें वीर्य से ही होती है ।

• वीर्य के दो भेद- अन्य आचार्यों ने उष्ण और शीत भेद से वीर्य को दो प्रकार का भी माना है ।

•  उष्ण – शीत वीर्य के गुण-

 उष्ण वीर्य से भ्रम ( Gidiness ) , तृष्णा ( Thirst ) , ग्लानि ( Depression ) , स्वेद ( Sweating ) , दाह ( Burning ) , आशु पाकिता ( शीघ्र पकना ) और वात तथा कफ का शमन होता है ।

शीत वीर्य ह्रादन ( प्रसन्नता ) , जीवन , स्तम्भन ( जड़ता ) और रक्तपित्त की शुद्धि ( प्रसादन ) करता है ।

•” जाठरेणाग्निना योगाद्यदुदेति रसान्तरम् ।

रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः “।। २० ।।

विपाक का लक्षण – खाये हुये मधुरादि रस वाले द्रव्यों का महास्रोतस में जठराग्नि द्वारा परिपाक होकर अन्त में जिस विशेष रस की उत्पत्ति होती है उसको विपाक कहते हैं ।

• विपाक के तीन भेद-

विपाक तीन प्रकार का होता है- ( १ ) मधुर ( Sweet ) और लवण ( Salt ) रस का मधुर विपाक , ( २ ) अम्ल ( Sour ) रस का अम्ल विपाक और शेष ( ३ ) कटु ( Pungent ) , तिक्त ( Bitter ) और कषाय ( Astringent ) रस का कटु विपाक होता है ।

•” रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम् । “

प्रभाव का लक्षण- रसादि में समानता ( दो या अधिक द्रव्यों में ) होने पर भी जो विशेष कर्म दिखायी देता है , वह ‘ प्रभाव ‘ है ।

• प्रभाव का उदाहरण –

दन्ती ( L.N.- Balospermum montanom Muell – Arg . ) रसादि ( वीर्य – विपाक ) में चित्रक के समान होने पर भी विरेचक है किन्तु चित्रक ( Eng : – Leadlwort , L.N. – Plumbago zeylanica Linn . ) नहीं है । मधुक ( मुलहठी Eng.- Liquorice , LN.- Glycyrrhizaglabra Linn . ) और मृवीका ( द्राक्षा Eng.- Grapes , L.N.- Vitis vinfera Linn . ) के रसदि में समान होने पर भी द्राक्षा विरेचक है किन्तु मुलहठी ( Eng . – Liquorice , L.N.- Glycyrrhizaglabra linn . ) विरेचक नहीं वामक है ।

घृत और दुग्ध के रसादि में समान होने पर भी घृत अग्नि दीपक है किन्तु दुग्ध अग्निदीपक नहीं है।

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