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DRAVY SHODHANADI PRAKARAN

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द्रव्य शोधनादि प्रकरण

शोधन प्रकरण

परिभाषा

"शोधनं कर्म विज्ञेयं द्रव्यदोषनिवारणम् ।
उद्दिष्टैरौषधैः सार्द्ध क्रियते पेषणादिकम् ।
मलविच्छित्तये यत्तु शोधनं तदिहोच्यते ।।"( र.त .2 / 52 )

किसी भी द्रव्य के मल को दूर करने के लिए बताई गई औषधियों के साथ मिलाकर मर्दन , क्षालन , निर्वाप आदि कर्म करने को शोधन कहा जाता है ।

विविध द्रव्यों की शोधन विधि

वत्सनाभ- वत्सनाभ के चने के बराबर छोटे – छोटे टुकड़े कर गोदुग्ध्र अजादुग्ध में दोलायन्त्र विधि से 6 घण्टे तक स्वेदन कर लेने से शुद्ध हो जाता है ।

कुचला -कुचला बीज को काञ्जी में डुबो कर 3 दिन तक पड़ारहने दें तथा तीन दिन बाद बीजों को काजी निकालकर बाहरी त्वचा को छीलकर अलग कर दे तथा धूप में सुखा कर लोहे के इमामदस्ते में कूटकर चूर्ण को रख ।

जयपाल -जयपाल के नूतन बीज को लेकर सर्वप्रथम उसका छिलका तथा बीज के दो दलों को अलग करके बीच हरे रंग के अंकुर सदृश जीभ को निकाल दें । अब इस जीभरहित बीज मज्जा को एक कपड़े में बाँधका दोलायन्त्र विधि से 1 प्रहर तक स्वेदन कर शुद्ध करें ।

धत्तूर- धत्तूर बीज को दोलायन्त्र विधि से गो दुग्ध में 3 घण्टे तक स्वेदन कर तत्पश्चात् गर्म जल से प्रक्षालन कर सुखा लेने से धत्तूर बीज शुद्ध हो जाता है ।

भंगा -भांग की पत्ती को जल में भिगो – निचोड़ कर धूप में सुखा लेने के पश्चात् इसे गोघृत में मन्द – मन्द अग्नि पर भून लें , इस प्रकार भांग शुद्ध हो जाती है ।

भल्लातक -एक मजबूत कपड़े की पोट्टली अथवा थैली में भल्लातक एवं इष्टिका चूर्ण भर कर हाथों के मध्यम दबाव से रगड़ें । जब ईंट का चूर्ण तैल से तर हो जाय और भल्लातक की त्वचा निकल जाय तब इसे गरम पानी में डालकर अच्छी प्रकार धोकर साफ कर सुखाकर रख लें ।

गुञ्जा -नवीन गुञ्जा बीज के मोटे चूर्ण को द्विगुण वस्त्र की पोट्टली में बाँधकर गोदुग्ध में दोलायन्त्र विधि से 6 घण्टे ( 2 प्रहर ) स्वेदन कर लेने से गुञ्जा बीज शुद्ध हो जाता है ।

स्नुहीदुग्ध -2 पल ( 8 तोला ) स्नुहीदुग्ध तथा 2 तोले चिञ्चा ( इमली ) पत्र स्वरस ( कपड़े से छना हुआ ) को एकत्र मिलाकर धूप में सुखा कर रख लें , इस प्रकार स्नुहीदुग्ध शुद्ध हो जाता है ।

लांगली- लांगली को गोमूत्र में एक दिन रखने से यह शुद्ध हो जाता है।

अहिफेन को आर्द्रक स्वरस की सात से इक्कीस भावना देकर सुखा कर रख लेने से अहिफेन शुद्ध हो जाता है ।

अतिविषा- अतिविषा को गोमय रस में स्वेदन करके धूप में सुखा लेने सुशुद्धिकरण हो जाता है ।

गुग्गुलु- गुग्गुलु को एक प्रहर तक चौगुने गोदुग्ध में स्वेदन कर शुद्ध करना चाहिए ।

•अष्टवर्ग के प्रतिनिधि द्रव्य ( भावमिश्र मतेन )

  1. जीवक → विदारीकन्द
  2. ऋषभक → विदारीकन्द
  3. मेदा → शतावरी
  4. महामेदा → शतावरी
  5. काकोली → अश्वगन्धा
  6. क्षीरकाकोली → अश्वगन्धा
  7. ऋद्धि → वाराहीकन्द
  8. वृद्धि → वाराहीकन्द

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