fbpx

DRAVDRVYA VIGYAN

by

द्रवद्रव्यविज्ञानीय भाग 2

• क्षीरवर्ग

गाय ( Bos Indicus ) , भैंस ( Bos Bubalus ) , बकरी ( Capra Sibica ) , हथिनी ( कारभ Camelus Dromediarius ) , स्त्री ( Homo Sapiens ) , भेड़ ( आविक Ovis Vignei ) , ऊंटनी ( ऐभ Elephas Indica ) और घोड़ी ( एकशफ- एक खुर ( नख ) वाली घोड़ी या गघी Equus sp . ) ये आठ प्रकार के दुग्ध ( Milk ) का वर्णन किया गया है ।

• दुग्ध के गुण-

 सभी प्रकार के दुग्ध विपाक और रस में मधुर , स्निग्ध , ओज ( रस रक्तादि समस्त धातुओं के सार ओज वर्द्धक ) और धातुओं ( रस रक्तादि समस्त सातों धातुओं ) को बढ़ाने वाला , वात – पित्त को नष्ट करने वाला , वृष्य ( वीर्य ) को बढ़ाने वाला , कफवर्द्धक , गुरु एवं शीतल होता है ।

• गो ( Bos Indicus ) दुग्ध-

प्राय : से तात्पर्य है कि सभी प्राणियों के दुग्ध एक से नहीं होते उनमें अपवाद भी होता है । गाय ( Bos Indicus ) का दुग्ध जीवनीय ( जीवन को बढ़ाने वाला ) और रसायन होता है। उर : क्षत और क्षीण धातु वाले रोगी के लिये हितकारी , मेधा ( बुद्धि ) , बल , दुग्ध ( स्त्रियों में स्तन्य ) को बढ़ाने वाला और सर ( समस्त शरीर में व्याप्त – फैल जाने वाला ) होता है , तथा श्रम – भ्रम ( Giddiness ) – मद का अत्यधिक सेवन , अलक्ष्मी ( दरिद्रता ) , श्वास ( Dyspnoea ) , कास ( Coughing ) , अतितृट् ( अत्यधिक प्यास ) , क्षुधा ( भूख ) , जीर्ण ज्वर ( Chronic fever ) , मूत्रकृच्छ्र ( Dysuria ) और रक्तपित्त रोगों को नष्ट करने वाला होता है।

• माहिषी ( भैंस Bos Bubalus के ) दुध का गुण-

अत्यग्नि ( जिसकी जठराग्नि तीव्र हो ) का व्यक्ति या जिसे निद्रा न आती हो उन दोनों के लिये भैंस का दुग्ध हितकारी होता है , यह अन्य दुग्धों से गरीय ( भारी ) और शीत वीर्य का होता है ।

• अजादुग्ध ( बकरी Capra Sibica के दुग्ध ) के गुण-

स्वभावतः बकरी अल्पाम्बु ( थोड़े जल को पीने वाली ) , व्यायाम ( इधर – उधर धूमती रहती है ) करने वाली , कटु ( कालीमिर्च ) और तिक्त ( नीम ) रस के द्रव्यों का सेवन करने वाली होती है , इसलिये इसका दुग्ध हल्का , शोष ( क्षय रोग Emaciation ) , ज्वर ( fever ) , श्वास ( Dyspnoea ) , रक्तपित्त ( Purpura ) और अतिसार ( Diarrhoea ) को नष्ट करने वाला होता है ।

• ऊंटनी ( उष्ट्र Camelus Dromediarius ) का दुग्ध- इसका दुग्ध थोड़ा रूक्ष , उष्ण , लवण रस , जठराग्नि तेज करने वाला और लघु होता है । यह वात , कफ , आनाह ( पेट फूलना ) , कृमि ( worms ) , शोफ ( शोथ Oedema ) , उदर रोग ( Abdominal disease – 8 Types ) और अर्श ( Piles ) में दिया जाता है ।

•  स्त्री ( Homo sapien ) का दुग्ध –

तर्पण , आश्योतन तथा नस्य के रूप में इसका प्रयोग करने से यह वात , पित्त , रक्त ( असृग ) , अभिघात ( चोट लगना ) और अक्षि ( नेत्र ) रोगों को जीतने ( शान्त करने ) वाला होता है ।

• भेंड़ ( Ovis Vignei ) का दुग्ध-

आविक ( भेड़ ) का दुग्ध अहृद्य ( हृदय के लिये हानिकारक ) , उष्ण , वात रोग नाशक , हिक्का ( Hiccough ) , श्वास ( Dyspnoea ) , पित्त और कफ को उत्पन्न करने वाला होता है ।

• हथिनी ( Elephas Indica ) का दुध- हथिनी का दुग्ध शरीर में स्थिरता लाने वाला अर्थात् दृढ़ ( मजबूत ) करने वाला होता है ।

• घोड़ी ( एकशफ Equus sp . ) का दुग्ध- यह उष्ण , लघु , शाखा ( रक्तादि धातुओं , त्वचा या हस्तपाद ) में स्थित वात दोष को नष्ट करने वाला , अम्ल – लवण रस वाला और शरीर में जड़ता ( स्तम्भता Stiffness ) उत्पन्न करने वाला होता है ।

• तक्र के गुण-

तक्र ( Butter milk ) – लघु ( Light ) , कषाय रस ( Astringent ) , अम्ल रस ( Sour ) , जठराग्नि को दीप्त ( तीव्र Appetiser ) करने वाला , कफवातनाशक , शोफ ( शोथ- Oedema ) , उदर रोग ( Abdominal disease – 8 types ) , अर्श ( Piles ) , ग्रहणी रोग ( Sprue or Dysentery ) , मूत्रग्रह ( मूत्रावरोध Dysuria ) , अरुचि , गुल्म ( Tumour ) , प्लीहा ( Spleenic disorder ) , घृत व्यापद् ( घृत के अतिसेवन से उत्पन्न रोग ) , गर विष , कृत्रिम विष ( Poison ) और पाण्डु ( Anaemia ) रोग को शान्त करता है ।

• तक्र सेवन का निषेध – क्षत ( Injury ) , उष्णकाल ( ग्रीष्म ) में , दुर्बल व्यक्ति को , मूर्छा ( Unconsciousness ) , भ्रम ( चक्कर Gddiness ) , दाह ( Burning ) और रक्तपित्त ( Purpura ) रोग में तक्र ( Butter Milk ) का सेवन ( पान ) नहीं करना चाहिये ।

• मस्तु के गुण- मस्तु भी तक्र के समान होता है , किन्तु यह सर ( अस्थिर – बहने वाला ) , स्रोतसों का शोधन करने वाला , विष्टम्भ ( obstruction ) को दूर करने वाला और लघु होता है।

• नवनीत के गुण-

 मक्खन ( Butter ) जो कि दही से ताजा ( नवं ) निकाला जाता है वह वृष्य ( बलकारक ) , शीतल , वर्ण बल और अग्नि ( जाठराग्नि ) को बढ़ाने वाला , संग्राही ( Astringent ) , वात – पित्त – असृक् ( रक्त ) -क्षय – अर्श ( Piles ) – अर्दित ( Facial paralysis ) और कास ( खांसी- Cough ) को नष्ट करने वाला होता है ।

• घृत के गुण-

धी ( बुद्धि ) , स्मृति ( Memory ) , मेधा ( प्रज्ञा – वस्तु विवेचना शक्ति ) , जठराग्नि , बल , आयु , शुक्र , नेत्र , बालक , वृद्ध , प्रजा ( सन्तान ) , कान्ति ( Grace ) सुकुमारता ( शरीर की कोमलता ) और स्वर को बढ़ाने ( उत्तम करने ) वाला है ।

क्षत ( उर : क्षतरोगी Injured ) , क्षीण , परिसर्प ( विसर्प Eryspelas ) , शस्त्राघात ( शस्त्र से चोट लगना ) , अग्नि से जलने पर और ग्लानि ( Depression of Mind ) इन सभी में लाभकारक अर्थात् प्रशस्त है ।

वात , पित्त , विष ( Poison ) , उन्माद ( Madness ) , शोष ( Ematiation ) , अलक्ष्मी ( दरिद्रता ) और ज्वर को नष्ट करने वाला है । स्नेहों ( घृत – तैल – वसा और मज्जा ) में श्रेष्ठ है , शीतल और वय ( आयु ) को स्थापित करने वाला अर्थात् वृद्धावस्था को नहीं आने देता है और आयु ( Age ) को सदैव स्थिर रखने वाला है ।

सहस्र ( One Thousand ) शक्ति ( वीर्य ) से युक्त है अर्थात् अनेकों शक्ति ( कार्य करने की क्षमता ) से युक्त और अनेक प्रकार के द्रव्यों के संयोग से हजारों कार्यों को करने वाला है । पुराना घृत ( गोघृत ) मद ( Alcohalism ) , अपस्मार ( Epilepsy ) , मूर्छ ( unconsciousness ) , शिर -कर्ण – नेत्र और योनि ( Vaginal ) रोगों को नष्ट करता है । व्रणों ( Abscess ) का शोधन ( Purification ) और रोपण ( Healing ) करता है ।

पूर्वोक्त कहे गये घृत के सामान्य गुणों से अधिक गुणकारी होता है , यह पुराना घृत अमृत ( Nector ) के समान होता है।

Leave a Comment

error: Content is protected !!