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DRAVDRVAY VIGYANIYA

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द्रवद्रव्यविज्ञानीय – भाग 4

तैलवर्गः

“तैलं स्वयोनिवत्तत्र मुख्यं तीक्ष्णं व्यवायि च । त्वग्दोषकृदचक्षुष्यं सूक्ष्मोष्णं कफकृन्न च “।। ५५ ।।

 कृशानां बृंहणायालं स्थूलानां कर्शनाय च ।

 वद्धविट्कंकृमिघ्नं च संस्कारात्सर्वरोगजित् “।।५६ ।।

सभी तैल अपने – अपने योनि ( उत्पत्ति स्थान और द्रव्य ) के गुणों के समान होते हैं । तैल ( तिल Eng . – Sesamum . L.N .. Sesamum Indicum Linn . ) मुख्य रूप से तीक्ष्ण , व्यवायी ( पहले सम्पूर्ण शरीर में फैलकर फिर पचने वाला ) , त्वचा के लिये दोषकारक , नेत्रों के लिये हानिकारक ( अचक्षुष्य ) , सूक्ष्म , उष्ण , कफ नष्ट करने वाला ( कफकृत् + न ) , कृश ( Lean or Emaciated ) को पुष्ट और स्थूल को कृश करने वाला , मल को बांधने , कृमि ( worms ) को नष्ट करने वाला और संस्कारों ( भिन्न – भिन्न द्रव्यों के साथ तैयार किया हुआ ) से भी रोगों को जीतने वाला होता है ।

• एरण्ड तैल ( Castor oil , L.N.- Ricinus Communislinn ) –

एरण्ड तैल तिक्त ( Bitter ) , उष्ण , मधुर ( स्वादु ) विरेचक ( सर Purgative ) , गुरु , अण्डवृद्धि ( व w Orchtis ) , गुल्म ( Tumour ) , वात , कफ , उदर रोग ( Abdominal Enlargement ) , विषम ज्वर , कटी ( कमर Waist ) , गुह्य प्रदेश ( गुदा – लिंग Anus – penis ) , कोष्ठ ( आशय ) और पृष्ठ ( Back ) में होने वाले शोथ ( Swelling ) और पीड़ा ( रूक् Pain ) को जीतता है अर्थात् अच्छा कर देता है।

• लाल एरण्ड तैल- यह तीक्ष्ण , उष्ण , पिच्छिल और विस्र ( आम गन्धि ) होता है ।

• सरसों ( Mustard L.N.- Brassica campestris Linn . Var . Sarson Prain ) का तेल-

कटु , उष्ण , तीक्ष्ण , को नष्ट करने वाला होता है । यह लघु , पित्त – रक्त ( पित्ताल ) कारक , कोठ ( चकत्ता Patch on the Skin ) , कुष्ठ ( Leprosy or skin diseases ) , अर्श ( Piles ) , व्रण ( Abscess ) और जन्तुओं ( Insects ) को नष्ट करने वाला होता है ।

• बहेड़े ( Eng.- Belliric myrobalan , L.N.- Terminalia bellirica Roxb . ) के तैल का गुण-

यह स्वादु ( मधुर ) , शीतल , केशवर्द्धक , गुरु , पित्त और वातनाशक होता है ।

• नीम ( Eng.- Margosa Tree , L.N. – Azadirachta Indica A.Juss . ) के तेल का गुण- अधिक उष्ण नहीं है , तिक्त रस , कृमि , कुष्ठ ( Skin diseases ) और कफनाशक होता है ।

• उमा ( अलसी- Eng.- Lin seed , L.N.- Linum Usitatissimum Linn . ) और कुसुम्भ ( L.N.- Carthamus Tinctorius ) के तेल का गुण-

यह उष्ण , त्वचा के रोग – कफ और पित्त को कुपित करने वाला होता है ।

• इन सभी तेलों में तिल ( Eng.- Sesamum , L.N.- Sesamum indicam Linn . ) का तेल सबसे श्रेष्ठ ( वरं ) और कुसुम्भ ( L.N.- Carthamus tinctorius ) का तेल हीन ( अवर ) गुण वाला होता है ।

• वसा ( fat ) और मज्जा ( Bone Marrow ) वातनाशक , बल – पित्त और कफ वर्द्धक तथा मांस ( Muscles ) के गुणों के समान गुण वाले होते हैं अर्थात् जिस वर्ग का जीव है उसी के मांस के गुण के समान होता है । मेद के गुण भी वसा और मज्जा के समान होते हैं ।

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