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DRAVDRAVYA VIGYANIYA

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द्रवद्रव्यविज्ञानीय – भाग-1

• अथ तोय वर्ग :

“जीवनं तर्पणं हृद्यं हादि बुद्धिप्रबोधनम् ।

तन्वव्यक्तरसं मृष्टं शीतं लघ्वमृतोपमम् ।।१ ।।

गङ्गाम्बु नभसो भ्रष्टं स्पृष्टं त्वन्दुमारुतैः ।

हिताहितत्वे तद्भूयो देशकालावपेक्षते ।।२ ।।”

• जलवर्ग-  

जल – जीवन ( प्राणधारक ) , तर्पण ( तृप्तिकारक ) , हृद्य ( हृदय के लिये प्रिय ) , ह्रादि ( प्रसन्नता कारक ) , बुद्धि को तीव्र करने वाला , तनु ( हल्का ) , अव्यक्त रस वाला , मृष्ट ( मन के लिये अनुकूल ) , शीतल , लघु और अमृत के समान गुण वाला होता है । गंगा का जल जो आकाश से गिरता है वह सूर्य ( अर्क ) , इन्दु ( चन्द्रमा ) और हवा के स्पर्श से देश और काल के अनुसार हित और अहित करता है ।

• पेयापेय जल की परीक्षा-

जिस बरसते हुये ( आन्तरिक्ष ) जल से पकाये ( अभिसिक्त किये ) गये शाल्यन्न ( शाली चावल भात ) चांदी के पात्र में रखा होने पर न तो सड़े ( अक्लिन्न ) और न हि वर्ण बदले वही जल गांगेय ‘ ( गंगा का जल ) है , इसे ही पीना चाहिये तथा अन्य कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये , अन्यथा इसके विपरीत ( जिसमें पका भात सड़ जाये या विवर्ण हो जाये ) जल सामुद्र जल होता हैं ।

इसे ( सामुद्र जल को ) आश्विन मास के अलावा अन्य महीनों में नहीं पीना चाहिये ।

• “कौपसारसताडागचौण्ड्यप्रास्रवणौद्धिदम् ।।” ( अ.सं.सू. ६/१२ )

वापीनदीतोयमिति तत् पुनः स्मृतमष्टधा ।”

 जल के 8 प्रकार-

( १ ) कौपम् ( कुएं का जल ) ,

( २ ) सारस ( बड़े तालाब या सरोवर का जल ) ,

( ३ ) ताडाग ( तालाब का जल ) ,

( ४ ) चौण्ड्य ( पर्वत में भूमि फोड़कर निकला जल ) ,

( ५ ) प्रस्रवण ( झरने का जल ) ,

( ६ ) औद्भिद ( भूमि फाड़कर निकलने वाला जल )

( ७ ) वापी ( बावड़ी – जिसमें नीचे तक जाने वाली सीढ़ियां- Step हों ) और

( ८ ) नदी का जल इन आठ स्थानों से जल प्राप्त होता है ।

• जल ( आठ प्रकार ) के गुण-

कुएं का जल – क्षारीय ( Alkaline ) और पित्त वर्द्धक होता है ,

सारस ( सरोवर ) का जल – अग्नि दीपक अर्थात् जठराग्नि को तीव्र करने वाला तथा अल्प वात वर्द्धक , मधुर ( स्वादु ) और लघु होता है ,

ताडाग ( तालाब ) का जल – गुरु ( Heavy ) और वातवर्द्धक होता है ,

चौण्डय् ( पत्थर के नीचे ) का जल- पित्तकारक ,

प्रास्त्रवण ( झरने ) का जल- दोष नाशक ,

औद्धिद ( भूमि फाड़कर निकलने वाला ) जल – मीठा ( स्वादु ) और पित्तनाशक ,

वापी ( बावड़ी ) का जल मधुर ( स्वादु ) और लघु ( Light ) तथा

नदी का जल- वातकारक , रूक्ष और कटु होता है ।

किन्तु इन कौपादि जलों का गुण धन्व ( जांगल ) देश , आनूप ( जलीय ) देश और पर्वतादि ( महीध्राणां ) स्थान के अनुसार उनके अपने गुणों गुरुता और लघुता के आधार पर समझना चाहिये ।

• भोजन के समय जल सेवन के गुण-

भोजन के मध्य में जल पीने से शरीर समान रहता है , अन्त में जल पीने से शरीर में स्थूलता आती है और भोजन के प्रारम्भ में जल पीने से शरीर में कृशता उत्पन्न होती है ।

• शीतल जल के गुण-

 इसके सेवन से मदात्यय ( मद्य के अधिक सेवन से उत्पन्न लक्षण Alcohalism ) , ग्लानि ( Depression ) , मूर्छा ( Unconsiousness ) , छर्दि ( वमन- Vomitting ) , श्रम ( Fatigue ) , भ्रम ( चक्कर आना Giddiness ) , तृष्णा ( Thirst ) , उष्णता , दाह ( Burning ) रक्त और विष को नष्ट करता है ।

• उष्ण जल के गुण-

यह जठराग्नि को दीप्त ( तीव्र ) करने वाला आहार को ठीक से पचाने ( Digestive ) वाला , गले के लिये हितकारक , लघु , वस्ति ( Bladder ) , का शोधन करने वाला है ।

हिक्का ( हिचकी- Hiccough ) , आध्मान ( पेट फूलना Tympanitis ) , वात , कफ , सद्यः शुद्धि ( वमनादि शोधन कर्म ) के बाद , नूतन ज्वर , कास ( खांसी- Cough ) , आम दोष , पीनस ( प्रतिश्याय ) , श्वास ( Dyspnoea ) और पार्श्वशूल में इसका सेवन करते हैं ।

•नरियल के जल का गुण-

 नारियल का जल ( भीतर का जल ) स्निग्ध , स्वादु ( मधुर ) , वृष्य ( बलकारक ) , शीतल और लघु तथा तृष्णा ( प्यास ) , पित्त और वायु नाशक , दीपन ( जठराग्नि को तीव्र करने वाला Appetisers ) और वस्ति ( मूत्राशय ) को शुद्ध करता है ।

• वर्षा काल का दिव्य ( आकाशीय ) जल-

अत्यन्त लाभकारक और नदी से लिया वही जल अत्यन्त अवर ( निम्न कोटि का अपथ्य और हानिकारक ) होता है ।

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