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DRAVDRAVYA VIGYANIYA

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द्रवद्रव्यविज्ञानीय • भाग 5

• मद्यवर्ग

मद्य ( Alcohal ) के गुण-

सभी प्रकार के युक्ति पूर्वक सेवन किये गये मद्य के गुण है- दीपन ( जठराग्नि को तीव्र करने वाला Appetisers ) , रुचिकारक ( भोजन में रुचि उत्पन्न करने वाला ) , तीक्ष्ण , उष्ण , तुष्टि ‘ ( मन को सन्तुष्ट Satisfied ) करने वाला , पुष्टि ( शरीर का पोषण ) करने वाला , स्वादु ( मधुर ) , तिक्त ( Bitter or Pungent ) , कटु , अम्ल पाक , अम्ल रस , सर ( विरेचक ) , कषाय ( Astringent ) , स्वर- आरोग्य – प्रतिभा और वर्ण को बढ़ाने वाले , लघु , जिनकी निद्रा नष्ट हो गयी हो अर्थात् निद्रा न आती हो ( Insomnia ) या निद्रा बहुत आती हो उनके लिये लाभकारक ( इन दोनों स्थितियों में सुधार लाने वाला ) , पित्तास्र ( पित्त – रक्त ) को दूषित करने वाला , कृश और स्थूल दोनों के लिये लाभकारक , रूक्ष और सूक्ष्म स्रोतसों में प्रवेश कर उसका शोधन करने वाला तथा वातकफनाशक हैं ।

बिना युक्ति ( अतिमात्रा ) के सेवन किया गया मद्य विष के समान मारक होता है ।

• सुरा ( Wine ) –

गुल्म ( Tumour ) , उदर रोग ( Abdominal disease ) , अर्श ( Piles ) ग्रहणी ( Sprue ) और शोष ( Ematiation ) नाशक , स्निग्ध , गुरु और वातनाशक होता है । यह मेद , रक्त ( असृक् ) , दुग्ध ( स्तन्य ) , मूत्र और कफ को बढ़ाने वाला होता है ।

• वारुणी के गुण- यह हृदय के लिये लाभकारक , लघु , तीक्ष्ण , शूल ( Pain ) , कास ( Coughing ) , वमि ( वमन Vomiting ) , श्वास ( Dyspnoea ) , विबन्ध ( constipation ) , आध्मान ( Tympanitis पेट में वायु का बढ़ना ) और पीनस ( Rhinitish ) को नष्ट करता है।

• विभीतक ( बहेड़े Terminalia belerica Roxb . ) से बनी सुरा-

यह तीव्र ( तेज ) नशा नहीं करती है , लघु है । यह व्रण ( Abscess ) , पाण्डुरोग ( Anaemia ) और कुष्ठ ( Skin disease ) में बहुत विरोधी नहीं होता है विष्टम्भिनी यवसुरा गुर्वी रूक्षा त्रिदोषला ।

• जौ ( Hordeum Vulgare ) की सुरा-

विष्टम्भी ( Obstructants ) ; गुरु ( Heavy ) , रूक्ष ( Dry ) और त्रिदोषकारक होती है ।

• अरिष्ट ‘ के गुण-

द्रव्य ( जिससे अरिष्ट बनाया गया है ) के गुण के समान ही अरिष्ट का गुण होता है ।

सभी प्रकार के मद्य से अरिष्ट में गुण अधिक होता है । ग्रहणी ( Sprue ) , पाण्डु ( Anaemia ) , कुष्ठ ( Skin disease ) , अर्श ( Piles ) , शोष ( Emaciation ) , शोफ ( oedema ) , उदर रोग ( Abdominal disease ) , ज्वर ( fever ) , गुल्म ( Tumour ) , कृमि ( worms ) और प्लीहा ( Spleenomegaly ) रोग को नष्ट करता है तथा कषाय ( Astringent ) कटु और वात वर्द्धक गुणों से युक्त होता है ।

• मार्दीक मद्य के गुण-

द्राक्षा ( Dry grapes ) के रस से तैय्यार किया गया मद्य लेखन ( कृश Emaciaton ) करने वाला , हृदय के लिये लाभकारक , अधिक उष्ण नहीं होता है , मधुर , सर ( मृदु विरेचक ) , पित्त और वायु ( अनिल ) को थोड़ी मात्रा में बढ़ाने वाला , पाण्डु ( Anaemia ) , मेह ( बहुमूत्रता Polyuria ) , अर्श ( Piles ) और कृमि ( worms ) को नष्ट करने वाला होता है । 

• खर्जुर मद्य के गुण-

द्राक्षा मद्य से कम गुणवाला , वातकारक और गुरु होता है ।

• शर्करा ( Sugar ) से बना मद्य-

सुगन्धित ( सुरभि ) , मधुर ( स्वादु ) , हृदय के लिये हितकारी , अधिक नशा नहीं करने वाला ओर लघु होता है ।

• गुड़ से बना हुआ मद्य-

मूत्र , मल ( शकृत् ) और वात को प्रवृत्त करने वाला , तर्पण कारक और जठराग्नि को दीप्त ( तीव्र Appetiser ) करने वाला होता है ।

•  मूत्र वर्ग

गाय ( गो Bos Indicus ) , अजा ( बकरी Capra Sibica ) , अवि ( भेंड Ovis Vignei ) , महिषी ( भैस Bos Bubalus ) , गज ( हाथी Elephas Indica ) , अश्व ( घोड़ा Elephas Cabalus ) , उष्ट्र ( ऊंट Camelus Dromediarius ) और खर ( गधे Equus Vulgaris ) का मूत्र पित्त वर्द्धक , रूक्ष , तीक्ष्ण , उष्ण , अनुरस ( मुख्य रस के बाद जिसका ज्ञान हो ) लवण , कटु , कृमि ( worms ) , शोफ ( oedema ) , उदर रोग ( Abdominal disease ) , आनाह , ( पेट फूलना- Tympanitis ) , शूल ( Pain ) , पाण्डु ( Anaemia ) , कफ , वायु , गुल्म ( Tumour ) अरुचि , विष ( Poison ) , श्वित्र ( Leucoderma ) , कुष्ठ ( Skin disease ) और अर्श ( Piles ) को जीत लेता है अर्थात् नष्ट कर देता है और लघु होता है ।

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