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DOSHOPRAKAMANIYA ADHYAY

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दोषोपक्रमणीय

• वायु का उपक्रम ( चिकित्सा ) –

वात की चिकित्सा है- स्नेहन , स्वेदन , मृदु ( हल्का ) संशोधन ( वमन विरेचनादि पंचकर्म ) के द्वारा शरीर से रोग को बाहर निकालना । स्वादु ( मधुर ) अम्ल , लवण और उष्ण भोजन का सेवन करना , अम्यङ्ग ( Massage ) और मर्दन ( शरीर को दबाना ) करना ।

वेष्टन ( वस या रस्सी से पीड़ित अंग को बाँधना ) , त्रासन ( भय दिखाना ) , सेंकना , पिठ्ठी ( उड़द की पिसी दाल ) या गुड़ से बने मद्य का सेवन , स्निग्ध और उष्ण वस्ति , सुख देने वाले वस्ति के नियमों का पालन करते हुए वस्ति ( Anaema ) देना , दीपन ( जठराग्नि को दीप्त – तीव्र करने वाले ) , पाचन ( खाद्य द्रव्यों का पाचन करने वाले- Digestive ) द्रव्यों से सिद्ध अनेक योनियों के स्नेह , विशेष मेद्य मांस रस , तैल और अनुवासन ( स्नेह ) वस्ति वायु की विशेष उपक्रम ( चिकित्सा ) है ।

• पित्त का उपक्रम ( चिकित्सा ) –

पित्त की चिकित्सा है- घृत ( देशी घी ) को पीना , मधुर और शीतल द्रव्यों से विरेचन , मधुर ( स्वादु ) , तिक्त और कषाय रस वाले भोजन तथा औषधियों का सेवन , सुगन्धित शीतल और मनोनुकूल ( हृदय के लिये लाभकर ) गन्ध का सेवन , कण्ठ में लटकने वाले मुक्तामणियों का हार धारण करना , कर्पूर – चंदन – खस का प्रतिक्षण लेप करना ।

प्रदोष ( रात्रि का प्रथम भाग ) , चन्द्रमा , श्वेत ग्रह ( सौद्य ) , सुन्दर गीत , शीतल वायु , ऐसे मित्र जिनसे कोई भेद न हों , अव्यक्त- मनमोहक वाणी वाले अनुकूल चलने वाली और शील से शोभित प्रिय पत्नियाँ ( दारा ) , ऐसा गृह जिसमें शीतल जल की धारायें चल रही हों , बाग के तालाब , उत्तम घाट वाले बड़े ( विपुल ) स्वच्छ तालाब के पास रेतीला स्थान , सुन्दर कमल वाले तालाब के किनारे जो वृक्षों से व्याप्त हों , मन को प्रसन्न करने वाले पदार्थ , दुग्घ ( पयः ) घृत और विरेचन ये पित्त की विशेष चिकित्सा है ।

• कफ का उपक्रम ( चिकित्सा ) –

 कफ की चिकित्सा है – विधिपूर्वक तीक्ष्ण वमन – विरेचन देना , रूक्ष – अल्प , तीक्ष्ण – उष्ण – कटु तिक्त एवं कषाय रस युक्त अन्न का सेवन , लम्बे समय से रखे मद्य का सेवन , सम्भोग में रूचि , रात्रि जागरण ( प्रजागर ) , अनेक प्रकार के व्यायाम , चिन्ता , रूक्ष द्रव्यों का सेवन और मर्दन ( Massage ) करना , विशेष रूप से वमन , यूष , क्षौद्र ( मधु ) , मेदनाशक द्रव्य का सेवन , धूम सेवन , उपवास ( Fasting ) , गण्डूष और सुख का अभाव अर्थात दुख ये सब सुख के उपाय अर्थात कफ नाशक हैं ।

• साम और निराम दोष के लक्षण-

स्रोतों का अवरोध , बल की हानि ( भ्रंश ) गुरूता ( Heavyness ) , वायु का अवरोध ( अनिलमूढ़ता ) , आलस्य , अपक्ति ( आहार का न पकना ) , निष्ठीवन ( मुख का स्राव- Salivation ) , मलावरोध , अरूचि , क्लम ( बिना परिश्रम के थकान ) और लिंगों में मलिनता होती है । निराम ( आमरहित ) दोषों में इसके विपरीत लक्षण होते हैं ।

• आम का लक्षण-

जठराग्नि का बल कम होने पर ( मन्दाग्नि होने पर उष्मणोऽल्पबलत्वेन ) प्रथम धातु रस का ठीक से पाचन नहीं होता है । यह अपक्व रस धातु दुष्ट ( विकृत ) होकर आमाशय ( Stomach ) में आ जाता है , तब इसी दूषित अपक्व आद्यरस धातु को ‘ आम ‘ कहते है । अन्य आचार्यों के मत से दुष्ट वातादि दोष ही एक दूसरे के साथ मूर्च्छना ( मिलना ) के कारण विष के समान ( भयंकर ) आम को उत्पन्न करते हैं ठीक वैसे ही जिस प्रकार ‘ कोदो धान ‘ देश – काल के कारण विष बन जाता है ।

इस आम से युक्त होने के कारण वातादि दोष और रस – रक्तादि दूष्य ( जो दूषित होता है वह दूष्य है ) दूषित होने पर साम कहे जाते हैं और इन्हीं आम से रोगों की उत्पत्ति ( उद्धव ) होती है ।

•साम शब्द का अर्थ- इस आम से मिले ( सम्पृक्त ) हुये दूषित वातादि दोष और रक्तादि दूष्य को ‘ साम ‘ कहा गया है तथा ने उत्पन्न रोगों को ‘ सामरोग ‘ ( साम ज्वर , साम ग्रहणी आदि ) कहा गया है।

• औषध सेवन काल-

औषध सेवन के दस कालों का वर्णन किया गया है- ( १ ) अनन्न औषध , ( २ ) अन्नादो ( प्राग्भक्त ) , ( ३ ) मध्ये ( भोजन के मध्य में ) , ( ४ ) अन्ते ( भोजन के अन्त में ) , ( ५ ) कवलान्तर ( प्रास के मध्य में ) , ( ६ ) आसे – ग्रासे , ( ७ ) मुहुः ( बार – बार ) , ( ८ ) सान्नम् ( अन्न के साथ ) , ( ९ ) सामुद्ग और ( १० ) निशा काल में ।

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