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DOSHON KI SANKHYA

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दोषों की संख्या

शरीर के घटक

‘ तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि ।। [ च ० शा ० 6/3]

शरीर की परिभाषा इस प्रकार कह सकते हैं कि जिसमें
( 1 ) पञ्चमहाभूतों संज्ञा उस का विकार समूह हो ।
[ 2 ] आत्मा का वास हो । तथा
[ 3 ] आंतर एवं बाह्य क्रियायें कार्य क सम्यक् भाव से हो रही हों , वह शरीर है ।

पदार्थ व शरीर में पञ्चमहाभूतों के विकार त्रिदोष , सप्तधातु तथा मल के रूप में सप्त धान होते हैं । ये ( दोष , धातु और मल ) शरीर के मूल माने गए हैं ।

” दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् “।। ( सु ० सू ० 15/3 ) “दोषधातुमला मूलं सदा देहस्य “।। ( अ ० हृ ० सू ० 11/1 )

•शरीर दोष- वात , पित्त , कफ।
•मानस दोष –
जिस प्रकार वात , पित्त एवं कफ , ये तीन शरीर दोष हैं इसी प्रकार मन को प्रभावित करने वाले रज एवं तम मानस दोष हैं ।

“वायुः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः” ।
“मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ।” (च ० सू ० 1/56)

•असाम्यावस्था के कारण / रोगों के त्रिविध कारण-

शारीर एवं मानस दोनों प्रकार की असाम्यावस्था ( विषमताओं ) के तीन प्रधान कारण हैं ।

“तत्र तु खल्वेषां द्वयानामपि दोषाणां त्रिविधं प्रकोपणं तद्यथा आत्म्येन्द्रिार्थसंयोगः प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति “।। ( च ० वि ० 6/7 )

•1. असात्म्येन्द्रिार्थसंयोगः – इन्द्रियों का अपने विषयों के साथ असात्म्य संयोग होना । असात्म्य संयोग का अर्थ है इन्द्रियों का अपने – अपने विषय के साथ समयोग न होकर अतियोग , अयोग अथवा मिथ्यायोग का होना

•2 . प्रज्ञापराध- प्रज्ञा के अन्तर्गत धी ( निश्चयात्मक बुद्धि ) , धृति ( धारणात्मक बुद्धि ) तथा स्मृति स्मरणात्मक बुद्धि ] का समावेश है । इनका अतियोग , अयोग अथवा मिथ्यायोग होना प्रज्ञापराध का कारण होता है ।

•3. परिणाम- काल [ ऋतुजन्य काल अथवा वातावरणजन्य काल ] का अतियोग , अयोग अथवा मिथ्यायोग होना ।

दोषों की संख्या यद्यपि सीमित है परन्तु प्रत्येक प्रकोपक कारण असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग प्रज्ञापराध तथा परिणाम की विभिन्नता के कारण अनगिनत प्रकार की व्याधियां एवं विकार उत्पन्न होते हैं।

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