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DOSHON KE SVAROOP

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दोषों के स्वरूप

•दोषों के स्वरूप

दोषों के स्वरूप को हम दो प्रकार से जान सकते हैं –
[ 1 ] उनके नामों की व्युत्पत्ति द्वारा तथा
[ 2 ] उनके गुण तथा कर्मों के विश्लेषण द्वारा ।

•नामों की व्युत्पत्ति

वात- ‘ वा गतिगन्धनयोः ‘ इति धातुः [ सु ० सू ० 21/5 ] | इस धातु से ‘ त ‘ औणादिक प्रत्यय करने से वात सिद्ध होता है । इसलिए वात का अर्थ है गति । गति के तीन अर्थ होते हैं- ज्ञान , गमन और प्राप्ति । शरीर में गति , ज्ञान तथा प्राप्ति के जनक को वात कहते हैं।

पित्त- ” तप सन्तापे ” [ सु ० सू ० 21/5 ] ।
इस धातु के ‘ त ‘ के स्थान में इत ‘ प्रत्यय करने से पित्त सिद्ध होता है । इसका अर्थ है दहन अथवा उष्ण करना । अतः शरीर में अग्नि कर्म के कर्ता को पित्त कहा है । पित्त को ‘ मायु ‘ भी कहा गया है ।

श्लेष्मा- “ श्लिष आलिंगने ” इस धातु के साथ ‘ मनिन् ‘ प्रत्यय करने से श्लेष्मन् सिद्ध होता है । इसका शब्दार्थ है मिलन , संयोग , आलिंगन । शरीर में इन क्रियाओं के कर्ता की संज्ञा श्लेष्मा है ।

दोषों के सामान्य प्राकृत गुण

वात के गुण

“रुक्षः शीतो लघुः सूक्ष्मश्चलोऽथ विशदः खरः । विपरीतगुणैर्द्रव्यर्मारुतः संप्रशाम्यति” ।। (च ० सू ० 1/58)

भौतिक गुण –
1.रूक्ष , 2. शीत , 3. लघु , 4. सूक्ष्म [ अव्यक्त , अमूर्त 5. चल [ अनवस्थितः ] 6. विशद , 7. खर

रासायनिक गुण –

  1. योगवाही [ योगवाही परं वायुः ]

मानसिक गुण –

  1. रजोगुण प्रधान 2. दारुणः [ वारुणः चरक ]

पित्त के गुण

” सस्नेहमुष्णं तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु ।
विपरीतगुणैः पित्तं द्रव्यैराशु प्रशाम्यति ।।”( च ० सू ० 1/59)

भौतिक गुण- स्निग्ध , उष्ण , तीक्ष्ण , द्रव , सर , रूक्ष , लघु , विशद ।
रासायनिक गुण- कटु , पीत , नील , विदग्धावस्था में अम्ल , विस्र व पूति ।
मानसिक गुण- सत्त्वगुणप्रधान ।

कफ के गुण

गुरुशीतमृदुस्निग्धमधुरस्थिरपिच्छिलाः ।
श्लेष्मणः प्रशमं यान्ति विपरीतगुणैर्गुणाः ।। (च ० सू ० 1/60)

भौतिक गुण- गुरु , शीत , मृदु , स्निग्ध , स्थिर , पिच्छिल , श्वेत , मन्द ।
रासायनिक गुण- प्राकृतावस्था में मधुर तथा वैकृतावस्था में लवण रस ।
मानसिक गुण- तमोगुणप्रधान ।

दोषों के सामान्य कर्म

वात के सामान्य कर्म –

“उत्साहोच्छ्वासनिःश्वासयेष्टा धातुगतिः समा ।
समो मोक्षो गतिमतां वायोः कर्माविकारजम् ।। (च ० सू ० 18/51)
उत्साह ( कार्य करने की मानसिक एवं शारीरिक प्रवृत्ति ) उच्छ्वास , निःश्वास ( श्वसन क्रिया ) , चेष्टा ( कायिक , वाचिक तथा मानसिक चेष्टायें ) धातुओं ( रसादि ) की सम्यक् प्रकार से गति , मलादि का सम्यक् प्रकार से शरीर मोक्षण ( निष्कासन ) , आदि क्रियायें अविकृत वात के कर्म हैं।

पित्त के सामान्य कर्म

“दर्शनं पक्तिरूष्मा च क्षुत्तृष्णादेहमार्दवम् ।
प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम् “।। (च ० सू ० 18/52)

देखना , पचाना [ भोजन आदि का शरीर की स्वाभाविक ऊष्मा को बनाए रखना , भूख तथा प्यास को उत्पन्न करना , शरीर की मृदुता बनाए रखना , प्रभा [ कांति ] , प्रसाद [ मानसिक प्रसन्नता ] , मेधा [ धारणात्मक बुद्धि ] को कार्यरत रखना ये अविकृत पित्त के कर्म हैं ।

कफ के सामान्य कर्म

“स्नेहो बन्धः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् । क्षमा धृतिरलोभश्च कफकर्माविकारजम् ।।”( च ० सू ०18 / 53 )

शरीर में स्नेह ( स्निग्धता ) , बन्ध ( विभिन्न रचनाओं का परस्पर अनुबन्ध ) , स्थिरत्व ( शारीरिक अवयवों में दृढ़ता ) गौरव ( गुरुता ) , वृषत्व ( वीर्यवत्ता ) , बल [ शारीरिक एवं मानसिक शक्ति तथा रोगप्रतिरोधक शक्ति ] एवं क्षमा , धैर्य तथा अलोभता आदि मानसिक प्रवृत्तियों का सम्यक् सम्पादन , अविकृत कफ के कर्म हैं ।

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