fbpx

DOSHON KE STHAN

by

दोषों के स्थान

दोषों का कार्यक्षेत्र समस्त शरीर है शरीर में इनकी क्रियाएं निरंतर होती रहती है शरीर के जिन स्थानों पर दोषों की क्रियाशीलता विशेष रूप से प्रकट होती है उन स्थानों को दोषों के स्थान विशेष कहते हैं।

वात के स्थान

“वस्तिः पुरीषाधानं कटिः , सक्थिनी पादावस्थीनि च वातस्थानानि , तत्रापि पक्वाशयो विशेषेण वातस्थानम्” ।।
(च ० सू ० 20/7)

वस्ति ( मूत्राशय ) , पुरीषाधान [ वृहदन्त्र ] , कटि [ श्रोणि भाग- pelvic region ] , सक्थिनी [ जंघा ] , पाद [ पैर ] और अस्थीनि [ अस्थियां ] वात के स्थान हैं परन्तु इनमें भी पक्वाशय [ वृहदन्त्र विशेष रूप से वात का स्थान है ।

पित्त का स्थान

“स्वेदो रसो लसीका रुधिरमामाशयश्च पित्तस्थानानि तत्राप्यामाशयो विशेषेण पित्तस्थानम्” ।।
(च ० सू ० 2017 )

स्वेद ( sweet ) , रस ( plasma ) , लसीका ( lymph ) , रक्त और अमाशय ये पित्त के स्थान हैं । इनमें भी आमाशय ( ग्रहणी सहित क्षुद्रान्त्र ) पित्त का विशेष स्थान है।

कफ के स्थान

“उर : शिरो ग्रीवा पर्वाण्यामाशयो मेदश्च श्लेष्मणः स्थानानि , तत्राप्यूरो विशेषेण श्लेष्मणः स्थानम् ।।”
( च ० सू ० 20/7 )

उरः ( वक्षः ) , सिर , ग्रीवा , पर्व ( Joints ) , आमाशय तथा मेद , ये कफ ( श्लेष्मा ) के स्थान हैं । इनमें भी उर श्लेष्मा का विशेष स्थान है।

Leave a Comment

error: Content is protected !!