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DOSHO KI KSHYA TATHA VRIDHI

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दोषों की क्षय तथा वृद्धि

दोषों के क्षय तथा वृद्धि के कारण

“सर्वदा सर्वभावनां सामान्यं वृद्धिकारणम् ।
हासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु ।। “(च ० सू ० 1/43 )

सर्वदा सम्पूर्ण भावों [ द्रव्य , गुण और कर्म ] की वृद्धि का कारण सामान्य [ समानता है और विशेष [ विभिन्नता ] हास का कारण है । सामान्य तथा विशेष की प्रवृत्ति ही वृद्धि एवं हास में कारण है ।

क्षीण वात के लक्षण

वात की क्षीणता के कारण शारीरिक चेष्टाओं में मन्दता , अंगसाद , भाषण में अल्पता , हर्ष अल्प , बुद्धि मन्द तथा संझानाश तक हो सकता है । कफ , वृद्धि के लक्षणों के समान आलस्य , गौरव आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ।

“वातक्षये मन्दचेष्टताऽल्पवाक्त्वमप्रहर्षो मूढसंशता च ।”( सु ० सू ० 15/9 )

क्षीण पित्त के लक्षण

शरीर में पित्त की क्रिया में कमी आने से शारीरिक ऊष्मा ( temperature ) में कमी जिससे शीतता का अनुभव होने लगता है । जठराग्नि मन्द हो जाती है अतः ठीक से आहर का पाक नहीं होता तथा शरीर की प्रभा [ कान्ति ] कम हो जाती है ।
“पित्तक्षये मन्दोमाग्निता निष्प्रभत्वं च ।”( सु ० सू ०15 / 9 )
“पित्ते मन्दोऽनलः शीतं प्रभाहानिः ।।”( अ ० ए ० सू ० 11/16)

क्षीण कफ के लक्षण

शरीर में कफ की क्रिया में क्षय होने से शरीर में रूक्षता बढ़ जाती है , अन्तर्दाह [ जलन ] होती है , आमाशय के अतिरिक्त अन्य श्लेष्मा के आशों में शून्यता [ खालीपन ] , हृदय में दीनता , संधियों में शिथिलता , भ्रम , दुर्बलता , प्यास अधिक तथा नींद कम हो जाती है ।

“कफे भ्रमः श्लेष्माशयानां शून्यत्वं हृदवः श्लथसंधिता ।।”( सु ० सू ० 157 )

वात वृद्धि के लक्षण

वात वृद्धि की अवस्था में भाषण में कर्कशता , शरीर में कृशता व श्यामता कालापन ) , अंगों में स्फुरण , उष्ण आहार विहार की इच्छा , निद्रा एवं बल का नाश , इन्दियों में क्षीणता , प्रलाप , भ्रम , दीनता तथा मल में रुकावट और उसका कठोर हो जाना आदि लक्षण उत्पन्न होते है ।

“वातवृद्धौ वाक्पारुष्यं काय कायं गात्रस्फुरणमुष्णकामिता निद्रानाशोऽल्पवलत्वं गाढ़वर्चस्त्वं च ।।”( सु ० सू ० 15/14 )

पित्त वृद्धि के लक्षण

पित्त की शरीर में वृद्धि हो जाने पर त्वचा का वर्ण पीला हो जाता है , शरीर में उष्णता ( temperature ) बढ़ जाती है , इन्द्रियों में दुर्बलता , तृष्णा . मूळ तथा मल – मूत्र – नेत्र में पीलापन , ये लक्षण शरीर में प्रकट होते है ।

“पीतविण्मूत्रनेत्रत्वकक्षुत्तृड्दाहाऽल्पनिद्रता पित्तम् ।।”( अ ०० सू ० 11/7)

कफ वृद्धि के लक्षण

शरीर में कफ के कार्यों में वृद्धि होने से शरीर का तापमान कम हो जाता है जिससे शीतता की अनुभूति होती है . स्थिरता , गुरुता , ग्लानि , तन्द्रा , अधिक निद्रा , सन्धि एवं अस्थियों में शिथिलता , मन्दाग्नि , मुख से लार का अधिक उत्पन्न होनात्र में अधिक श्वेतता , अंगों में शिथिलता एवं श्वास तथा कास की शिकायत होने लगती हैं।

“श्लेष्मवृद्धौ शौकल्यं शैत्यं स्थैर्थं गौरवमवसादस्तन्द्रानिद्रासन्ध्य स्थिविश्लेषश्च ।। “
(सु ० सू ० 15/14 )

साम रोग के लक्षण

साम दोषों के कारण शरीर के स्रोतों में अवरोध उत्पन्न हो जाता है , शारीरिक बल क्षीण हो जाता है , शरीर में भारीपन – आलस्य – क्लम ( शीघ्र थक जाना ) की दशा हो जाती है , वात क्रियायें ठीक प्रकार से नहीं होती हैं , आहार का पाचन ठीक प्रकार से नहीं होता है , मुख से लार अधिक उत्पन्न होने लगती हैं , मल का अवरोध हो जाता है , और भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है । निराम दोषों के लक्षण इनके विपरीत होते हैं।

” स्रोतोरोधबलअंशगौरवानिलमूढ़ताः ।
आलस्यापक्तिनिष्ठीव – मलसङ्गारुचिक्लमाः ।।
लिङ्गं मलानां सामानां निरामाणां विपर्ययः ।। (अ ०हृ० सू ० 13.32,24)

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