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DOSHADI VIGYANIYA

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दोषादिविज्ञानीय भाग -1

• “दोषधातुमला मूलं सदा देहस्य-

•  शरीर के मूल-

दोष ( शारीरिक- वात , पित्त , कफ , मानसिक- रज , तम ) , धातु ( रस , रक्त , मांस , मेद , अस्थि , मज्जा शुक्र ) और मल ( पुरीष , मूत्र , स्वेद और नेत्र – कर्ण तथा नासिका आदि के स्राव ) ही शरीर का मूल ( Root ) है अर्थात् यह शरीर तभी स्वस्थ रह सकता है । जब ये तीनों ( दोष – धातु और मल ) सम्यक् रूप में रहें ।

•  वात – पित्त – कफ के प्राकृत कर्म-

 मुख्य गुण चल है उसके प्राकृत रहने पर- उत्साह Encouragement ) उच्छ्वास ( Expiration ) , निश्वास ( Inspiration ) , चेष्टा ( Activity ) , वेग प्रवर्तन ( मल – मूत्रादि वेगों को बाहर निकालना Excrition ) , धातुओं ( रस – रक्तादि ) की उचित गति , इन्द्रियों ( अक्षाणां ) का अपने विषय को ठीक से ग्रहण करना ( पाटवेन – पटुता या निपुणता ) आदि से शरीर को अनुहीत ( उपकृत ) करता है ।

पित्त ( प्राकृत ) – पाचन शक्ति ( Digestion ) , उष्णता , दर्शन ( देखने की शक्ति ) , क्षुधा ( भूख ) , तृड् ( प्यास – Thirst ) , रुचि , प्रभा ( कान्ति – Grace ) , मेधा ( ज्ञान ) , धी ( बुद्धि ) , शौर्य और शरीर में मृदुता उत्पन्न करता है । कफ ( प्राकृत ) – शरीर में स्थिरता , स्निग्धता , सन्धियों को बाँधना और सहनशीलता उत्पन्न करता है।

• “प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणे ।

गर्भोत्पादश्च धातूनां श्रेष्ठं कर्म क्रमात्स्मृतम् ।।४ ।। “

• धातुओं का कार्य-

प्रीणन ( चित्त की प्रसन्नता ) , जीवन ( प्राणधारण ) , लेप ( अस्थियों को ढक कर एक सा करना ) , स्नेहन ( स्निग्धता ) , धारण ( शरीर का आकार बनाना ) , पूरण ( अस्थियों को अन्दर से भरना ) और गोत्पादन ( गर्भ की उत्पत्ति करना ) क्रम से धातुओं ( रस – रक्तादि ) के ये उत्तम कार्य है ।

• मलों का कार्य- पुरीष ( Stool ) का कार्य है- अवष्टम्भन् ( धारण ) करना , मूत्र ( Urine ) का कार्य है- क्लेद को बाहर निकालना और स्वेद का कार्य है- क्लेद को धारण करना ।

• वृद्ध वायु का लक्षण- कार्य ( कृशता – दुबलापन ) , कालापन , उष्णता की इच्छा , कम्पन , आनाह ( Distension of abdomen ) , मलावरोध , बल – निद्रा और इन्द्रियों की ( विषय को ग्रहण करने की ) शक्ति का नष्ट होना , प्रलाप ( असम्बद्ध भाषण – Irrelivent talk ) , भ्रम ( चक्कर आना – Dizziness ) और दीनता ( बेचारगी ) के लक्षण होते हैं ।

•  वृद्ध पित्त के लक्षण- पित्त के अपनी मात्रा से अधिक बढ़ने पर मुल – मूत्र – नेत्र और त्वचा में पीलापन , भूख , प्यास , दाह और निद्रा का कम होने के लक्षण होते हैं ।

• वृद्ध कफ के लक्षण-

कफ अपनी मात्रा से अधिक बढ़ने पर – अग्निसाद ( मन्दाग्नि ) , प्रसेक ( लालानाव- Salivation ) , आलस्य ( Lazyness ) , शरीर में गुरुता ( भारीपन- Heavyness ) , श्वेत – वर्ण , शीतलता , शरीर में शिथिलता ( श्लथाङ्गत्व ) , श्वास ( Dyspnoea ) और कास ( खांसी आना- Coughing ) के लक्षण होते हैं ।

• वृद्ध रस का लक्षण- इसके लक्षण कफ के समान होते हैं ।

•  वृद्ध रक्त ( Blood ) का लक्षण- विसर्प , प्लीहा वृद्धि ( Spleenomegaly ) , विद्रधी ( Abscess ) , कुष्ठ , वातरक्त ( Gout ) , रक्तपित्त , गुल्म ( Tumour ) , उपकुश ( दन्तरोग ) , कामला ( Jaundice ) , व्यङ्ग ( Mole ) रोग , जठराग्नि का नष्ट होना ( अग्निनाश ) , सम्मोह ( मूर्छा- Unconsciousness ) , त्वचा – नेत्र और मूत्र का रक्त वर्ण का होना ।

• वृद्ध मांस का लक्षण- इससे गलगण्ड ( Goiter ) , गण्डार्बुद , ग्रन्थि ( Glands ) उरु – उदर वृद्धि और कण्ठादि में अधिमांस ( मांस के ऊपर मांस ) की उत्पत्ति होती है । 

• वृद्ध मेद ( Fat ) का लक्षण- मांस के समान रोग , परिश्रम के बिना थकान , श्वास रोग ( Dyspnoea ) , स्फिग् ( Hip ) . स्तन ( Breast ) और उदर लटकने ( लम्बनम् ) लगते हैं ।

• वृद्ध अस्थि ( Bone ) का लक्षण- इसमें अस्थि के नीचे अस्थि ( अध्यस्थि ) और दांत के नीचे दांत ( अधिदन्त ) का निकलना ।

• वृद्ध मज्जा ( Bone – marrow ) का लक्षण- नेत्र और अंगों में गुरुता , पर्व ( Nodes ) और सन्धियों ( Joints ) के मूल में स्थूलता तथा कष्ट साध्य फुसियों की उत्पत्ति होती है ।

• वृद्ध शुक्र ( Semen ) का लक्षण- स्त्रीसंग की अत्यन्त इच्छा होना और शुक्राश्मरी के लक्षण होते हैं ।

• वृद्ध पुरीष ( Stool ) का लक्षण- इससे कुक्षि में आध्मान ( उदर का फूलना Distension ) , आटोप ( पेट में गुड़गुड़ाहट ) , गुरुता और पीड़ा की उत्पत्ति होती है ।

• वृद्ध मूत्र ( Urine ) का लक्षण- इससे वस्ति प्रदेश ( Inguinal region ) में पीड़ा और मूत्र त्याग करने के बाद मूत्र त्याग नहीं किया ऐसा ज्ञान होना ( कृते + ऽपि + अकृत् + संज्ञताम् ) ।

• वृद्ध स्वेद ( Sweat ) का लक्षण- अति स्वेद ( Excess sweating ) , स्वेद की अत्यन्त दुर्गन्ध ( Foul smell ) और कण्डू ( खुजली- Itching ) की उत्पत्ति होती है ।

• वृद्ध नेत्रादि के मल का लक्षण- इस प्रकार दूषिकादि ( नेत्रादि ) मलों से भी मलों की अधिकता और उस स्थान की गुरुता आदि से समझना चाहिये ।

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