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DOSHABHEDIYA ADHYAYA

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दोषभेदीय अध्याय भाग – 1

• वायु का स्थान- पक्वाशय ( Large intestines ) कटि ( Inguinal region ) , सक्थि ( Legs ) , श्रोत्र ( Ears ) , अस्थि ( Bones ) और स्पर्शेन्द्रिय ( त्वचा- Skin ) वायु का स्थान है , इसमें भी पक्वाशय ( Large intestines ) विशेष स्थान है ।

•  पित्त का स्थान- नाभि ( Umblical region – Deodenum ) , आमाशय ( Stomach ) , स्वेद ( पसीना- Sweat ) , रक्त ( Blood ) , रस ( आहार के पाचन के बाद उत्पन्न प्रसाद भाग है- रस धातु ) और नेत्र तथा स्पर्शन् ( त्वचा ) पित्त के स्थान हैं , इसमें भी नाभि प्रदेश ( Deodenum ) को विशेष स्थान माना है ।

• कफ का स्थान- उर ( वक्ष- Chest ) , कण्ठ ( Throat ) , शिर , क्लोम , पर्व ( Small joints ) और आमाशय ( Stomach ) , रस ( आहार रस ) , मेद ; घ्राण ( नासिका ) और जिह्वा ये कफ के स्थान हैं उर : प्रदेश विशेष स्थान है ।

• प्राण वायु के स्थान – कार्य- इसमें प्राण वायु मूर्धा ( शिर ) में रहती है । उर ( Chest ) और कण्ठ में घूमती रहती है , बुद्धि हृदय , इन्द्रिय और मन को धारण करती है ।

थूकना ( Spitting ) , क्षवथु ( छीकना – Sneezing ) , उद्गार ( डकार- Belching ) , निःश्वास ( Expiration ) और अन्न को अन्दर प्रवेश ( निगलना ) कराना इसका कार्य है

• उदानवायु का स्थान – कार्य- उर ( वक्ष ) इसका स्थान है , नासिका , नाभि और गले में संचरण करता है । वाक्प्रवृति ( बोलना ) , प्रयत्न ( Try ) करना , ऊर्जा ( Energy ) , बल , वर्ण और स्मृति ( Memory ) इसका कर्म है ।

•  व्यान वायु का स्थान – कार्य- व्यान वायु हृदय में स्थित रहती है , सम्पूर्ण शरीर में गति करती है । गति करना , अपक्षेपण ( अंगों को नीचे ले जाना ) और उत्क्षेपण ( अंगों को ऊपर ले जाना ) , निमेष – उन्मेष ( पलक को गिराना और ऊपर उठाना ) आदि शरीर की प्राय : सभी क्रियायें इसी के अधीन हैं अर्थात् इसी के द्वारा सम्पादित होती हैं ।

• समान वायु का स्थान – कार्य- यह विशेष रूप से पाचकाग्नि के पास रहती है और सम्पूर्ण कोष्ठ में विचरण करती है । इसका कार्य है- अन्न को ग्रहण करना , पचाना ( To digest ) , विवेचना करना – सार और किट्ट को अलग – अलग करना तथा मुञ्चन ( किट्ट मूत्र , मल को नीचे प्रवृत्त करना ) ।

• अपान वायु का स्थान – कार्य- यह अपान स्थान ( गुदा ) में रहती है , श्रोणि ( Pelvic region ) , वस्ति , मेढ़ ( Penis ) और उरु ( Thigh ) प्रदेश में विचरण करती है । इसका कार्य है- शुक्र ( Semen ) , आर्तव , शकृद् ( Stool ) , मूत्र ( Urine ) और गर्भ ( Foetus ) को शरीर से बाहर निकालना ।

• पित्त पाँच प्रकार ( पाचक , रजक , साधक , आलोचक और भ्राजक ) का होता है ।

• पाचक पित्त- पक्वाशय और आमाशय ( Stomach ) के मध्य ( ग्रहणी – Duodenum ) में रहने वाला पित्त जो पाच भौतिक होने पर भी ‘ तेज ‘ गुण की अधिकता से द्रवता को त्याग कर पाक आदि कार्य करने से ‘ अनल ‘ ( अग्नि ) शब्द से कहा जाता है । यह पित्त अन्न को पकाता ( Digest ) है , सार – किट्ट ( Extract – waste products ) को अलग – अलग करता है और वहीं स्थित रहकर शेष पित्तों को बल प्रदान ( अनुग्रहित ) करता है , इस पित्त को ‘ पाचक ‘ पित्त कहते हैं ।

• रञ्जक पित्त- आमाशय ( Stomach ) में रहने वाला और रस ( आहार – रस ) को रंगने के कारण इसे ‘ रक्षक ‘ पित्त कहते हैं ।

• साधकं हृद्गतं पित्तं साधक पित्त- यह हृदय में रहता है , बुद्धि , मेघा और अभिमान आदि के द्वारा अभिप्रेत ( इच्छित- Wanted ) विषय को सिद्ध करता है इसलिये इसे ‘ साधक पित्त ‘ कहते है ।

• आलोचक पित्त- यह नेत्रों में स्थित होता है और रूप को दिखाता है इसलिये इसे ‘ आलोचक ‘ कहते हैं ।

• भ्राजक पित्त- यह त्वचा ( Skin ) में स्थित होता है और त्वचा का दीपन ( भाजन ) करता है इसलिये इसे ‘ भाजक कहते है ।

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