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DOSHABHEDIYA ADHYAY

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दोषभेदीय अध्याय भाग -2

• श्लेष्मा के भेद- श्लेष्मा ( कफ ) के पांच भेद हैं ।

• अवलम्बक कफ- उर : ( वक्ष- Chest ) प्रदेश में रहता हुआ अपनी शक्ति ( वीर्य ) से त्रिक ( Waist ) का और अपनी तथा अन्न की शक्ति से हृदय का अवलम्बन ( Support ) करता है । वक्ष में रहते हुये ही जलीय कार्यों से ( क्लेदन – तर्पण – पूरण ) शेष कफ स्थानों का अवलम्बन ( Support ) करता है , इसीलिये इसको ‘ अवलम्बक ‘ कफ कहते हैं ।

• क्लेदक कफ- जो कफ आमाशय ( Stomach ) में स्थित है , वह अन्न – समूह ( अन्नसंघात ) का क्लेदन ( गीला ) करता है वह ‘ क्लेदक कफ है ।

•  बोधक कफ- यह रसना ( जिह्वा- Toung ) में रहता है और रस ( मधुरादि ) का ज्ञान कराता है , इसलिये इसे ‘ बोधक ‘ कफ कहते है ।

• तर्पक कफ- जो कफ शिर में स्थित रहते हुये इन्द्रियों ( अक्ष ) का तर्पण करता है , वह ‘ तर्पक ‘ कफ है ।

• श्लेषक कफ- जो कफ सन्धियों ( Joints ) में स्थित रहकर सन्धियों ( Joints ) का श्लेषण ( स्नेहन और बन्धन ) करता है , वह ‘ श्लेषक ‘ कफ है ।

• वात का चय – प्रकोप और शमन- उष्णता से युक्त रूक्ष आदि गुण वायु का सञ्चय करते हैं , शीत से प्रकोप ( वायु का ) होता है और उष्णता से युक्त स्निग्ध आदि गुणों के द्रव्यों से शान्त होता है ।

• पित्त का सञ्चय – प्रकोप और शमन- शीत से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण पित्त का सञ्चय करते हैं । उष्णता से पित्त कुपित होता है और शीत युक्त मन्दादि गुण से पित्त का शमन होता है ।

• कफ का सञ्चय – प्रकोप और शमन- शीत युक्त स्निग्धादि गुण कफ का सञ्चय करते है । उष्णता से कफ कुपित होता है और से युक्त रूक्षादि गुण से कफ का शमन होता है ।

• व्याधियों के लक्षण- ( १ ) दृष्टकर्मज ( दोषज ) रोग- इसमें निदान ( कारण ) के अनुसार दोषों के लक्षण वाले रोग होते हैं , ( २ ) अदृष्ट कर्मज रोग- इसमें कारण के बिना ही रोग उत्पन्न होते हैं और ( ३ ) उभयज ( दोषकर्मज या दृष्टअदृष्ट कर्मज ) रोग थोड़े ( अल्प ) कारण होने पर ही बहुत बड़े रोग का रूप ले लेता हैं ।

• चिकित्सा- ( १ ) दोषज रोग- विरोधी द्रव्य के सेवन से शान्त हो जाता है , ( २ ) कर्मज रोग- कर्म ( पूर्वजन्म ) के क्षय होने से शान्त हो जाता है और ( ३ ) दोष और कर्मज रोग – दोष और कर्म दोनों के क्षय होने से शान्त होता है ।

•व्याधि के भेद- रोग दो प्रकार के होते हैं- ( १ ) स्वतन्त्र और ( २ ) परतन्त्र।

• परतन्त्र दो प्रकार का होता है- १. पूर्वरूप रोग से पूर्व होने वाले लक्षण , और २. उपद्रव- रोग के बाद होने वाले लक्षण ।

• स्वतन्त्र – परतन्त्र के लक्षण- जिन रोगों की उत्पत्ति और शान्ति ( उपशय ) उनके अपने कारणों द्वारा होता है , वो स्वतन्त्र रोग हैं , इनमें उस रोग के लक्षण स्पष्ट होते हैं । इसके विपरीत अर्थात् जिनमें रोगों की उत्पत्ति और शान्ति अपने कारणों के अनुसार न हों और लक्षण स्पष्ट न हो वो परतन्त्र रोग होते हैं । चिकित्सक को प्रत्येक रोग में कुपित वात – पित्त और कफ को सावधानी से ( स्वतन्त्रता और परतन्त्रता की दृष्टि से ) पहचानना चाहिये ।

• परतन्त्र व्याधियों की चिकित्सा- प्रधान ( स्वतंत्र ) रोगों के शान्त होने पर अप्रधान ( परतंत्र ) रोग स्वयं ही शान्त हो जाते हैं , यदि फिर भी ( परतंत्र रोग ) शान्त न हों तो चिकित्सा करनी चाहिये या उपद्रव ( Complications ) शक्तिशाली हो तो चिकित्सा करनी चाहिये । यह क्लिष्ट व्याधि ( उपद्रव ) शरीर में अत्यन्त पीड़ा करने ( कष्ट देने ) वाला होता है ।

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