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DOSHAADI VIGYANIYA

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दोषादिविज्ञानीय भाग -2

• क्षीण वात के लक्षण- अंगों में शिथिलता ( सादो ) , थोड़ा बोलना , संज्ञामोह ( ज्ञान का नष्ट होना ) और कफ वृद्धि से होने वाले रोगों ( आमय ) के उत्पत्ति की सम्भावना होती है ।

• क्षीण पित्त के लक्षण- अग्नि ( जठराग्नि- अनल 🙂 का मन्द होना , शरीर में शीतलता और प्रभा ( कान्ति- Grace ) का नाश होता है ।

• क्षीण कफ के लक्षण- भ्रम ( चक्कर आना- Dizziness ) , कफ के आशय ( वक्ष प्रदेश ) में शून्यता ( खालीपन ) , हृदय में द्रव आना ( धड़कन- Palpitation का बढ़ना ) और सन्धियों में शिथिलता होती है ।

• रस के क्षय होने पर लक्षण- शरीर में रूक्षता , श्रम ( थकान- Fatigue ) , शोष ( शरीर का शुष्क होना ) , ग्लानि ( Depression ) और शब्द ( ऊँची आवाज ) का सहन नहीं होने के लक्षण होते हैं ।

• रक्त ( Blood ) के क्षय होने पर लक्षण- अम्ल ( Sour ) रस और शिशिर ( ठण्डे ) द्रव्यों में रुचि , शिराओं में शिथिलता और रूक्षता होती है ।

• मांस ( Muscles ) के क्षय के लक्षण- इसमें इन्द्रियों ( अक्ष ) में ग्लानि ( Depression ) , गण्ड और स्फिक् ( Hip ) में शुष्कता तथा सन्धियों ( Joints ) में वेदना होती है ।

•  मेद ( Fat ) क्षय के लक्षण- कटि ( Waist ) में संज्ञा का ( स्वाप ) नष्ट होना , प्लीहा की वृद्धि ( Spleenomegaly ) और अंगों में कृशता होती है ।

• अस्थि ( Bone ) क्षय के लक्षण- अस्थियों में वेदना , दन्त – केश और नख आदि का गिरना ( शदन ) ।

• मज्जा ( Bone – marrow ) क्षय के लक्षण- अस्थियों में खोखलापन ( सौषिर्य ) , भ्रम ( Delusion ) और नेत्र के सामने अंधेरा ( तिमिर ) होना ।

• शुक्र ( Semen ) क्षय के लक्षण- शुक्र का देर में क्षरण होना ( निकलना ) या शुक्र में रक्त का आना , वृषण ( Testicles ) में अत्यन्त वेदना होना और मेढ़ ( Penis ) में दाह होता है ।

• पुरीष ( Stool ) क्षय के लक्षण- इसमें वायु शब्द के साथ ( शब्द युक्त वायु ) आंत्रों ( Intestines ) में ऐंठन ( वेष्टयन्निव करती हुयी उदर ( कुक्षौ ) में घूमती है और हृदय तथा पार्श्व को दबाती हुयी ऊपर जाती है ।

• मूत्र ( Urine ) क्षय के लक्षण- मूत्र थोड़ी मात्रा में , कठिनता से , वर्ण ( Colour ) बदला हुआ या रक्त ( स – अस्र ) मिला हुआ आता है ।

• स्वेद ( Sweat ) क्षय के लक्षण- रोम का गिरना ( च्युतिः ) , रोम में कड़ापन और त्वचा फटती ( स्फुटन ) है ।

•  घ्राणादि मल क्षय के लक्षण- नासिका – नेत्र – कर्णादि के जो मल अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण कठिनाई से देखे जाते हैं , उनके अपने मल के स्थानों ( कर्ण – नासिका – नेत्र ) के शुष्क होने , वेदना ( तोद ) , शून्यता और लघुता के लक्षण होते हैं ।

• “ओजस्तु तेजो घातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् ।

हृदयस्थमपि व्यापि देहस्थितिनिबन्धनम् “।। ३७ ।।

स्निग्धं सोमात्मकं शुद्धमीषल्लोहितपीतकम् ।

यन्नाशे नियतं नाशो यस्मिस्तिष्ठति तिष्ठति ।। ३८ ।।

निष्पद्यन्ते यतो भावा विविधा देहसंश्रयाः ।

‘ ओज का लक्षण- रस धातु से शुक्र धातु तक का जो उत्कृष्ट तेज है , वही ‘ ओज ‘ है । यह हृदय में स्थित रहते हुये भी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त ( फैला ) रहता है और जीवन की आधार है । यह ओज स्निग्ध , सोम जैसा ( सोम स्वरूप ) , शुद्ध – थोड़ा सा लाल और पीत वर्ण का होता है । इसके ( ओज के ) नष्ट होने से निश्चित ही नाश – मृत्यु हो जाती है और इसके रहने से जीवन रहता है । इसके शरीर में रहने से अनेक प्रकार के भाव उत्पन्न होते हैं ।

• ओज के क्षय के कारण- क्रोध , भूख , ध्यान में लगे रहने , शोक और श्रम ( थकान ) से ओज का क्षय ( कम ) हो जाता है । इसके क्षय होने से मनुष्य डरता है ( बिभेति ) , दुर्बल होता है , रात – दिन सोचता ( ध्यायति ) रहता है , इन्द्रियां शक्तिहीन ( व्यथित ) हो जाती है , शरीर की कान्ति ( Grace ) नष्ट हो जाती है , मन दुःखी , रूक्षता ( शरीर मे ) और स्वर धीमा हो जाता है , इसकी चिकित्सा के लिये- जीवनीय गण की औषधियों से सिद्ध दुग्ध और मांस रस आदि देना उत्तम औषध है ।

•ओज की वृद्धि होने पर शरीर में तुष्टि ( प्रसन्नता ) , अंगों की पुष्टि और बल की वृद्धि होती है ।

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