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DINCHARYA

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  दिनचर्या’ भाग- 1

• प्रातः उठने का समय-

स्वस्थ व्यक्ति को आयु की रक्षा के लिये ब्राह्म मुहूर्त में उठना चाहिये ।

• प्रात : उठने के पश्चात्-

शरीर की चिन्ता ( रात्रि का आहार जीर्ण हुआ है या नहीं ) से मुक्त होकर मलोत्सर्ग करना चाहिये ।

• दन्त धावन विधि-

सर्वप्रथम दातुन से नीचे के दांतों को साफ करते हैं उसके बाद ऊपर के दांतों को साफ करते हैं ।

दातुन के साथ चूर्ण ( मंजन ) के प्रयोग का भी सुश्रुत ने वर्णन किया है ।

दोष और ऋतु के अनुसार या मुख के स्वाद के विपरीत रस वाला दातुन का प्रयोग करना चाहिये ।

वात की प्रधानता से मुख का स्वाद कषाय , पित्त की प्रधानता और कफ की प्रधानता से मधुर होता है , इसी प्रकार वर्षा में वातं , शरद् में पित्त और हेमन्त में कफ की प्रधानता होती है , अत : इसके विपरीत रस वाला दातुन प्रयोग में लाना चाहिये ।

•इससे मुख की मलिनता , विरसता ( Tastelessness ) , दुर्गन्ध ( Foul smell ) , जिला – मुख और दन्त रोग नष्ट होकर आहार में रुचि , मुख में स्वच्छता और लघुता आती है ।

•दन्तधावन का निषेध-

अजीर्ण ( Indigestion ) , वमन ( Vomiting ) , श्वास ( Dyspnoea ) , कास ( Coughing ) , ज्वर ( Fever ) , अर्दित ( Facial Paralysis- चरक ) , तृष्णा ( Thirst ) , आस्यपाक ( मुखपाक – Stomatitis ) , हृदय – नेत्र – शिर और कर्ण के रोगी को दातुन नहीं करना चाहिये ।

• सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेत् ।

सौवीराञ्जन ( सूर्मा ) के गुण- सौवीराजन को नित्य नेत्रों में लगाना हितकारी होता है , इसलिये इसे लगाना चाहिये ।

• रसाञ्जन की विधि-

नेत्र तेज ( पित्त ) का स्थान है , इसलिये उसे विशेष रूप से कफ से भय होता है , अत : कफ को बहाने के लिये प्रत्येक सात रात्रि के बाद रसाञ्जन का प्रयोग करना चाहिये ।

• अञ्जन का लाभ-

जिस प्रकार गन्दे स्वर्णादि की तेल , कपड़ा आदि से शुद्धि की जाती है , उसी प्रकार नेत्र को शुद्ध करने के लिये अञ्जन , आश्च्योतन आदि का प्रयोग किया जाता है ।

आँवले का जल आश्च्योतन के लिये सर्वोत्तम होता है ।

• नस्यादि सेवन विधि- अञ्जन के बाद नावन ( नस्य ) , गण्डूष , धूमपान और ताम्बूल का क्रमश : सेवन करना चाहिये ।

• गण्डूष-

वह प्रक्रिया है जिसमें मुख में इतना द्रव भरा जाये जिससे उसे मुख में दायें – बायें घुमाया न जा सके कवल- वह है जिसमें मुख में भरे द्रव को आसानी से दायें – बायें घुमाया जा सके । 

•धूमपान-

गण्डूष के बाद प्रायोगिक धूम ( Smoking ) का सेवन , सुगन्धित द्रव्य ( कस्तूरी , चन्दन ) आदि का लेप और पुष्प की माला धारण करते हैं । धूम सेवन से जत्रु ( Clavicle ) के ऊपर वात – कफज रोग नहीं होते हैं । इसके तीन भेद हैं-

१. प्रायोगिक ,

२. स्नेहिक और

३. शिरोविरेचनिक ।

इनमें प्रायोगिक स्वस्थ व्यक्ति को नित्य लेना चाहिये और शेष दो विशेष रूप से रोगावस्था के लिये होता है । ( अ.सं.सू. ३/३२ )

ताम्बूल सेवन की प्रथा प्राचीन काल से ही है । पहले इसे अतिथि के आवभगत में देते थे ।

इसके ( पान के ) सेवन से भोजन में रूचि , विशदता ( मुख की स्वच्छता ) होती है , यह हृदय के लिये शक्तिवर्द्धक है ।

अष्टांगसंग्रहकार के अनुसार सोकर उठने के पश्चात् , भोजन – स्नान और वमन के बाद ताम्बूल सेवन करना हितकर होता है । दो पत्ते पान , एक सुपाड़ी का टुकड़ा खदिर चूर्ण के साथ सेवन करना चाहिये ।

• ताम्बूल सेवन का निषेध- क्षत ( उर : क्षत – Lung’s injury , क्षतज कास ) , पित्तास्त्र ( रक्तपित्त ) , रूक्ष प्रकृति , अभिष्यन्द ( नेत्रों में वेदना ) होने पर , विष – मूर्छा ( Unconsciousness ) और मद ( Intoxication ) से पीड़ित होने पर तथा शोष के रोगी को ताम्बूल सेवन करना अपथ्य है

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