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DINCHARYA

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दिनचर्या भाग – 3

•भोजन की विधि

पूर्व में सेवन किये गये आहार के जीर्ण हो जाने पर ही हितकारी और पथ्यकारक भोजन को मात्रा में सेवन करना चाहिये । अधारणीय ( मल – मूत्रादि के ) अप्रवृत्त वेगों को बलपूर्वक बाहर नहीं निकालना चाहिये ।

 मल – मूत्रादि का वेग उपस्थित होने पर सर्वप्रथम उनका त्याग करना चाहिये उसके बाद अन्य कार्यों को करना चाहिये और साध्य रोगों को शान्त किये ( जीते ) बिना अन्य कार्य नहीं करना चाहिये ।

• “सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।

 सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् “।। २० ।।

धर्म का महत्व- सभी प्राणियों की सभी प्रवृत्तियां ( कार्य ) सुख की प्राप्ति के लिये होती है और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं हो सकती इसलिये सभी को धर्म में तत्पर रहना चाहिये ।

•”भक्त्या कल्याणमित्राणि सेवेतेतरदूरगः ।”

 मित्र और शत्रु के प्रति आचरण- कल्याण चाहने वाले मित्रों पर श्रद्धा : और विश्वास रखना चाहिये जबकि अन्य से जो कल्याण चाहने वाले नहीं हैं , उनसे दूर रहना चाहिये ।

• “हिंसास्तेयान्यथाकामं पैशुन्यं परुषानृते ।।२१ ।।

सम्भिन्नालापं व्यापादमभिध्यां दृग्विपर्ययम् ।

 पापं कर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत् ।। २२ ।।”

 दशविध पाप का त्याग-

दश प्रकार के पाप कर्म जो शरीर , मन और वाणी के द्वारा किये जाते हैं , इनका त्याग करना चाहिये , जैसे-

शारीरिक पाप कर्म है- १. हिंसा ( प्राणियों को मारना ) , २. स्तेय ( चोरी करना ) , ३. अन्यथा कर्म ( अगम्य स्त्री गुरु – स्त्री आदि से मैथुन करना ) ,

वाचिक पाप कर्म है- ४. पैशुन्य ( चुगली या दूसरों की निन्दा करना Back biting ) , ५. परुष ( कठोर वचन- Harsh talk ) , ६. अनृत ( झूठ बोलना- Tell alie ) , ७. सम्भिन्न प्रलाप ( असंबद्ध बोलना- Irrelivent talk ) और

मानसिक पाप कर्म है -८ . व्यापाद ( दूसरों को हानि पहुँचाने के लिये सोचना ) , ९ . अभिध्या ( ईष्या या दूसरे के धन को लेने की इच्छा करना ) और १०. दृग्विपर्यय ( नास्तिकता या आप्त वचनों में अश्रद्धा करना )

इन दश प्रकार के पाप कर्मों का त्याग कर देना चाहिये ।

• रात्रिचर्या-

रात्रि में बाहर नहीं जाना चाहिये किन्तु यदि आवश्यक कार्य आ ही जाये तो डंडा ( Wooden rod ) लेकर , सिर पर मौली ( पगड़ी – Turban ) बाँधकर और सहायक ( एक और व्यक्ति – Helper ) को साथ लेकर जाना चाहिये ।

• “आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः । अनुकुर्यात्तमेवातो लौकिकेऽर्थे परीक्षकः” ।।४५ ।।

सदाचार-

बुद्धिमान ( धीमान 🙂 व्यक्ति के लिये सभी व्यावहारिक कार्यों का आचार्य ( गुरु ) संसार ही है । इसलिये परीक्षक ( विचारक ) व्यक्ति को लौकिक ( सांसारिक ) व्यवहार में लोक का ही अनुकरण करना चाहिये अर्थात् वही कार्य करना चाहिये जो संसार के श्रेष्ठ व्यक्ति करते हों या किये हों ।

• “आर्द्रसन्तानता त्याग : कायवाक्चेतसां दमः ।

स्वार्थबुद्धिः परार्थेषु पर्याप्तमिति सव्रतम् ।।४६ ।।”

• सद्व्रत के लक्षण-

आर्द्र सन्तानता ( अत्यन्त करुणा या सभी जीवों में दयाभाव ) , त्याग , कायिक ( शारीरिक ) , वाचिक ( वाणी के सम्बन्धित ) , और मानसिक रूप से इन्द्रियों का दमन ( शान्त ) , दूसरे के कार्यों को भी अपना ही कार्य समझना ये चारों ही सम्पूर्ण रूप से सद्बत सज्जनों का धर्म ) है

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