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DINCHARYA

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दिनचर्या  भाग – 2

“अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं , स जराश्रमवातहा ।

दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुःस्वप्नसुत्वक्त्वदायकृत्” ।।८ ।।

•अभ्यङ्ग ( Massage ) के गुण-

शरीर पर प्रतिदिन अभ्यंग ( तैल से मालिश ) करना चाहिये , इसके सेवन से जरा ( वृद्धावस्था ) , श्रम ( थकान – Fatigue ) और वायु का नाश होता है ।

इससे दृष्टि स्वच्छ होती है , शरीर पुष्ट होता है , आयु की वृद्धि होती है , नींद अच्छी आती है , त्वचा सुन्दर और शरीर दृढ़ होता है ।

“शिरःश्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत् ।”

• शिर , कान और पैर में विशेष रूप से अभ्यंग करना चाहिये ।

•अभ्यङ्ग ( Massage ) का निषेध-

कफ से पीड़ित , जिसका संशोधन ( वमन – विरेचन आदि पंचकर्म ) किया गया हो और अजीर्ण रोगी का अभ्यङ्ग ( Massage ) वर्जित किया गया है ।

• “लाघवं कर्मसामर्थ्य दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः ।

विभक्तघनगात्रत्वं व्यायामादुपजायते ।।१० ।।”

व्यायाम ( Exercise ) से लाभ-

व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन , काम करने की शक्ति , अग्नि का तीव्र होना और मेद का नाश होता है । शरीर के अंगों का विभक्त होना , अर्थात् शरीर के जो अंग मेद ( Fat ) के बढ़ने से एक समान हो गये रहते हैं वो व्यायाम करने के कारण मेद का क्षय होने से पृथक् -२ दिखायी देने लगते हैं ।

• “वातपित्तामयी बालो वृद्धोऽजीर्णी च तं त्यजेत् ।

व्यायाम के अयोग्य-

वात – पित्तज रोगी बालक , वृद्ध और अजीर्ण के रोगी को व्यायाम नहीं करनी चाहिये ।

• व्यायाम के योग्य – अवधि-

शक्तिशाली और स्निग्ध भोजन करने वाले व्यक्ति को शीतकाल और वसन्त ऋतु में अपनी आधी शक्ति के बराबर व्यायाम करना चाहिये और शेष ऋतुओं ( ग्रीष्म , वर्षा , शरद् ) में आधी शक्ति से भी कम व्यायाम करना चाहिये ।

•व्यायाम के पश्चात् कर्म-

व्यायाम के बाद शरीर का इस प्रकार मर्दन ( Massage ) करना चाहिये जिससे किसी प्रकार का कष्ट न हो ।

• अति व्यायाम से हानि-

अधिक व्यायाम करने से तृष्णा ( Thirst ) , क्षय , प्रतमक श्वास , रक्तपित्त , श्रम ( थकान- Fatigue ) , क्लम ( बिना परिश्रम किये ही थकान का होना ) , कास ( Cough ) , ज्वर ( Fever ) और वमन ( Emesis ) की उत्पत्ति होती है ।

• उबटन ( Unguent ) से लाभ- यह क्रिया कफ को नष्ट करती है , मेद को विलीन ( Disolve ) करती है , अंगों को स्थिर दृढ़- Strong ) करती है और त्वचा को ( अत्यन्त ) निर्मल ( सुन्दर – स्वच्छ ) बनाती है ।

• स्नान के गुण-

स्नान से जठराग्नि तीव्र होती है , वृष्यकारक ( शुक्रवृद्धि – कारक ) , आयुष्य ( आयु बढ़ाने वाला ) , ओज और बल की वृद्धि करने वाला तथा कण्डू ( Itiching ) , मल , श्रम ( Fatigue ) , स्वेद ( Sweat ) , तन्द्रा ( Drowsiness ) , तृट् ( Thirst ) , दाह ( Burning ) और पाप ( बुरी भावनाओं ) को नष्ट करने वाला होता है ।

• स्नान के अयोग्य-

अर्दित ( Facial paralisis- चरक ) , नेत्र – आस्य ( मुख ) -कर्ण के रोग और अतिसार ( Diarrhoea ) , आध्मान ( Tympanitis ) , पीनस ( जीर्ण प्रतिश्याय- Chronic catarrh ) और अजीर्ण ( Indigestion ) में तथा भोजन करने के बाद तुरन्त स्नान नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसा स्नान गर्हित ( निन्द्य ) है ।

• उष्ण जल से स्नान

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