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DIK NIROOPAN

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•दिक् निरूपण

आचार्य चरक ने ‘ दिक् ‘ की नव द्रव्यों में गणना करके भी इसकी परिभाषा ( Definition ) और लक्षण ( Symptoms ) का वर्णन कहीं भी नहीं किया है ।

आचार्य सुश्रुत भी इस विषय पर मौन है ।

दिशा ( Direction ) का लक्षण –

तर्क संग्रह के मतानुसार प्राची पूर्व ( East ) , पश्चिम ( West ) , उत्तर ( Norh ) और दक्षिण ( South ) आदि दश नामों से जिसे जाना जाता है और व्यवहार में कहा जाता है वही दिशा ( Direction ) है । यह नित्य ( Universal ) और विभू ( व्यापक ) है ।

वैशेषिक दर्शन के अनुसार यत : ( जिससे ) , इदम् । ( यह है ) , इति ( ऐसा व्यवहार है ) या यत : ( जिससे ) अर्थात् जिन कारणों से होता है उसी को दिशा कहते हैं ।

मुक्तावली के अनुसार- जिससे यह ज्ञान होता है कि यह इसकी अपेक्षा दूर ( Far away ) है और यह पास ( Near ) है वही दिशा का लक्षण ( लिङ्ग ) है ।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिससे परापरत्व ( दूर – पास ) का ज्ञान हो उसे ‘ दिशा ‘ ( Direc tion ) कहते हैं ।
यह एक और नित्य है , एक होने पर भी पूर्व ( East ) – पश्चिम ( West ) , उत्तर ( North ) और दक्षिण ( South ) आदि नाम से वर्णित की जाती है ।

संख्या , परिमाण , पृथक्त्व , संयोग और विभाग ये पांच दिशा के गुण हैं।

अमरकोष में दिशा के पर्यायवाचक ( Synonyms ) वर्णित किये गये हैं ककुभ , काष्ठा , आशा और हरित आदि ।

वस्तुतः दिशा एक ही है , किन्तु उपाधि भेद से इसके दश नाम बताये गये हैं –
१ . प्राची ( पूर्व- East ) ,
२. अवाची ( दक्षिण- South ) ,
३. प्रतीची ( पश्चिम- West ) और
४. उदीची ( उत्तर- North ) ।
इसके अतिरिक्त चारों दिशाओं के मध्य ( Middle ) में जो कोण ( Angle ) हैं , उन कोणों ( Angles ) की चार दिशायें हैं —
५ . ईशान कोण ( पूर्व – उत्तर- East – North quarter ) ,
६. वायव्य कोण ( उत्तर – पश्चिम- North – West quarter ) ,
७. नैऋत्य कोण ( पश्चिम – दक्षिण- West South quarter ) और
८. आग्नेय कोण ( दक्षिण – पूर्व- South – East quarter ) । ऊपर और नीचे की दो दिशायें हैं –
९ . उर्ध्व देश ( आकाश- Space ) और
१०. अध : देश ( पाताल ) ।
इस प्रकार कुल दश दिशाओं ( Ten directions ) का वर्णन हैं ।

आयुर्वेद में दिक् ( दिशा ) का महत्व –

जिस प्रकार प्रत्येक शुभ कार्यों के लिये मुहुर्त का विचार आवश्यक होता है , ठीक उसी प्रकार आयुर्वेद में भी भवन , यज्ञवेदी , औषध या चिकित्सा आदि के लिये भी दिशायें नियत की गयी हैं , स्वस्थ – वृत ( Hy giene ) की दृष्टि से भी मल – शौच , भोजन , शयन आदि के लिये दिशाओं का अत्यन्त महत्व दिया गया है ।

कुटी प्रावेशिक ( Indoor ) रसायन सेवनार्थ कुटी को पूर्व ( East ) या उत्तर ( North ) दिशा की ओर होना चाहिये ।

निरूह वस्ति ( Decoction enema ) के लिये रोगी को पूर्व दिशा की ओर सिर करके लेटने का विधान है , क्योंकि ऐसी मान्यता है कि पूर्व दिशा में देवता का स्थान है अत : उनकी स्तुति के लिये व्यक्ति का सिर पूर्व दिशा में रखते हैं ।

उत्तर दिशा ‘ ( हिमालय ) में उत्पन्न होने वाली वनौषधियां उत्तम मानी गयी है ।

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