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DHATU NIRMAN EVAM POSHAN KARMA

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धातु निर्माण तथा पोषण कर्म

शरीर की धातुओं के निर्माण तथा पोषण के सम्बन्ध में मुख्य रूप से तीन मान्यतायें प्रचलित हैं
( 1 ) क्षीर दधि न्याय
( 2 ) केदारी कुल्या न्याय तथा
( 3 ) खलेकपोत न्याय ।

न्याय उस मान्यता का नाम है जिसकी प्रमाणों द्वारा परीक्षा की जा सके ।
प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः ‘ प्रमाणों द्वारा अर्थ की परीक्षा करना न्याय है ।

( 1 ) क्षीर दधि न्याय –

इस मत के अनुसार जिस प्रकार सम्पूर्ण दूध दही में परिवर्तित हो जाता है।
उसी प्रकार अन्न रस धातु में , रस धातु रक्त धातु में , रक्त धातु मांस धातु में , मांस धातु मेद धातु में , मेद धातु अस्थिधातु में , अस्थि धातु मज्जा धातु में तथा मज्जाधातु शुक्र धातु में सम्पूर्ण रूपेण परिवर्तित हो जाती है ।

इस पक्ष को क्षीर दधि के उदाहरण से समझाया गया है कि जिस प्रकार समस्त दूध दही में परिणत हो जाता है अत इसे ” क्षीरदधिन्याय ” कहते हैं ।

इस मान्यता के अनुसार पाचन हो जाने पर प्रत्येक धातु के परिणाम होते हैं-
( 1 ) प्रसाद भाग तथा
( 2 ) मल भाग ।

प्रसाद भाग स्थूल और सूक्ष्म दो भागों में विभाजित हो जाता है । स्थूल प्रसादांश से उस धातु का निर्माण तथा पोषण होता है तथा सूक्ष्म प्रसादांश से उपधातु का निर्माण और पोषण होता है।

( 2 ) कुल्या न्याय केदारी

जिस प्रकार एक बगीचे को सींचने के लिए नालियां ( कुल्या ] बनाई जाती हैं और जो केदारी [ क्यारी ] निकट होती है कुल्या का जल वहां पहिले पहुंचता है ।
इसी प्रकार अन्न रस से रस धातु का निर्माण होता है तथा अन्न रस ही रक्ताशय में पहुंच रक्त सधर्मी अंश से रक्त धातु का निर्माण , मांसाशय में पहुंचकर मांस सधर्मी अंश से मांस धातु का निर्माण , मेद के आशय में मेद सधर्मी अंश से मेद धातु का निर्माण , अस्थ्याशय में पहुंच अस्थि सधर्मी अंश से अस्थि धातु का निर्माण , मज्जाशय में पहुंच मज्जा सधर्मी अंश से मज्जाधातु का निर्माण तथा शुक्राशय में पहुंच शुक्र सधर्मी अंश से शुक्र धातु का निर्माण करता है ।

( 3 ) खलेकपोत न्याय

जिस प्रकार खलिहान में दाना चुगने के पश्चात् कपोत वापिस अपने घर को जाते हैं और कपोत का घर जितनी अधिक दूरी पर होगा उसको वहां पहुँचने के लिए उतना ही अधिक समय लगेगा ।
इसी प्रकार अन्नरस ( खलिहान ) से धातुओं का पोषण तथा निर्माण होता रहता है परन्तु प्रत्येक धातु का पोषण तथा निर्माण का मार्ग पृथक् – पृथक् होता है ।
जैसे कि प्रत्येक कपोत का अपने घर को लौटाने का मार्ग पृथक् – पृथक होता है ।
जो धातु जितनी दूर से होगी अर्थात् जिसका स्रोत जितना अधिक लम्बा होगा उस तक निर्माण तथा पोषण सामग्री पहुंचने में उतना ही अधिक समय लगेगा तथा स्रोत मार्ग भी सूक्ष्म व सूक्ष्मतर होता चला जायेगा ।

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