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दीर्घजीवितीय अध्याय

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दीर्घजीवितीय अध्याय


•आयुर्वेद की परिभाषा


हितायु ,अहितायु ,सुखायु ,दुखायु
ये चार प्रकार की आयु बताई गई है इन चार पर इनका वर्णन जिस ग्रंथ में मिलता है वह आयुर्वेद है।


आयु
शरीर , इंद्रिय, सत्त्व, आत्मा इनके संयोग को आयु कहते हैं।


आयु के पर्याय
धारि ,जीवितम्, नित्यग, अनुबंध
• सभी वेदों में आयुर्वेद पुण्यतम् वेद है ऐसा आचार्य चरक का मत है।
• सामान्य तथा विशेष में अंतर
सदा सभी भावो की वृद्धि करने वाला सामान्य है तथा सदा सभी भावों का ह्राय करने वाला विशेष है।


त्रिदंड/ त्रिस्तंभ
सत्त्व ,आत्मा, शरीर

• द्रव्य
द्रव्य दो प्रकार के होते हैं
कारण द्रव्य और कार्य द्रव्य
कारण द्रव्य की संख्या 9 है पंचमहाभूत ,मन ,आत्मा, दिशा और काल
कार्य द्रव्य दो प्रकार के होते हैं चेतन द्रव्य तथा अचेतन द्रव्य है।


गुण
गुण की संख्या आचार्य चरक के अनुसार 41 है
सार्थक या इंद्रिय गुण या वैशेषिक गुण 5
गुर्वादी गुण या शारीरिक गुण 20
आत्मा या अध्यात्मा गुण 6
परादि या सामान्य गुण 10


कर्म
प्रयत्न द्वारा की गई चेष्टा कर्म कहलाती है।
कर्म पांच प्रकार के बताए गए हैं (वैशेषिक दर्शन के अनुसार)
उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुन्चन, प्रसारण, गमन
आचार्य चरक ने विमान स्थान में कर्म दो प्रकार के बताए हैं देव कर्म जो पूर्वजन्मकृत कर्म है तथा
पौरुष कर्म जो वर्तमान कालिक कर्म है।


रोगों के त्रिविध हेतु
रोगों के तीन कारण बताए गए हैं काल, बुद्धि, इंद्रियार्थ का मिथ्या, हीन ,अतियोग होना।
• रोग और आरोग्य के दो आश्रय शरीर और मन बताए गए हैं।
• दोष दो प्रकार के होते हैं शारीरिक दोष तथा मानसिक दोष
• शारीरिक दोष तीन प्रकार के होते हैं -वात ,पित्त ,कफ
• मानसिक दोष दो प्रकार के होते हैं रज ,तम इनमें राज्य प्रधान होता है।


चिकित्सा सूत्र
शारीरिक दोष – दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय
मानसिक दोष- ज्ञान, विज्ञान, धैर्य ,स्मृति, समाधि
• असाध्य रोगों की चिकित्सा का उपदेश नहीं दिया जाता है

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