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DARSHANSHASTRA

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दर्शनशास्त्र

दर्शन शब्द की व्याख्या

दर्शन का अर्थ है – दृश्यते अनेन इति दर्शनम्।

अर्थात जिसके द्वारा देखा जाए या पुरुष तात्विक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया जाए , जो इस सृष्टि का उत्पादक है या जिस से मोक्ष की प्राप्ति होती है वही दर्शन है।

• दर्शन की उत्पत्ति

समस्त ज्ञान का मूल वेदों को माना गया है अतः दर्शन का मूल भी वेद ही है ।
प्रत्येक वेद में उपवेद ब्राह्मण ग्रंथ एवं उपनिषद् है इन्हीं के माध्यम से कालांतर में दर्शनशास्त्र की उत्पत्ति हुई ।

किसी भी दर्शन के मुख्य चार विषय है जिन पर चिंतन किया गया है
१.हेय – दुख का वास्तविक स्वरूप जो त्याग करना है ।
२.हेयहेतु – दुख का वास्तविक कारण क्या है।
३.हान – दुख का अभाव कैसे हो।
४.हानोपाय – दुख निवृति का साधन।

दर्शन एवं इनका विभाजन हिंदू ग्रंथ कारों ने भारतीय दर्शन को दो भागों में विभक्त किया है १. आस्तिक दर्शन और २. नास्तिक दर्शन

१.आस्तिक दर्शन
आस्तिक दर्शन वह है जो वेदों को माने ,परलोक में विश्वास रखने वाला और ईश्वर में आस्था रखने वाला हो ।

•आस्तिक दर्शन को 6 भागों में विभक्त किया गया है
१. न्याय दर्शन २.वैशेषिक दर्शन ३.सांख्य दर्शन ४.योग दर्शन ५..मीमांसा दर्शन ६. वेदांत दर्शन

२.नास्तिक दर्शन –
साधारण भाषा में नास्तिक वह है जो ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता यह वेदों को न मानकर उनकी निंदा करता है ।

•मनु ने कहा है कि “नास्तिको वेद निंदकः” है और परलोक या पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते

१. न्याय दर्शन

आस्तिक दर्शनों में सर्वप्रथम न्याय दर्शन का वर्णन इसलिए किया गया है क्योंकि वैदिक धर्म के स्वरूप को जानने के लिए जिस तर्क की आवश्यकता है।उसे इसी के आधार पर जाना जाता है।
न्याय का अर्थ है विभिन्न परमाणु की सहायता से तत्व की परीक्षा जो विभिन्न परमाणु के द्वारा की जाती है ।

• न्याय शब्द का परिभाषा अर्थ है -प्रतिज्ञा ,हेतु ,दृष्टांत, उपनयन और निगमन इन्हें पंच अवयव के नाम से भी जाना जाता है ।

•प्रमाण का विशेष वर्णन होने के कारण इसे प्रमाण शास्त्र भी कहते हैं ।

२. वैशेषिक दर्शन

वैशेषिक दर्शन को कणाद और औलूक्य दर्शन भी कहा गया है इसके आद्य प्रवर्तक महर्षि कणाद और महर्षि औलूक्य थे।
•कणाद से तात्पर्य है कणो का भक्षण करने वाला ।
कहा जाता है कि यह सड़क के किनारे पड़े अन्न को खाया करते थे और यह भी कहा जाता है कि यह दिन में ग्रंथ रचना में व्यस्त रहते थे और रात्रि के समय में ही जीविकोपार्जन के लिए उलूक अर्थात उल्लू के समान बाहर निकलते थे।

कुछ लोगों ने इनके पिता की संज्ञा उलूक होने के कारण इनका नाम औलूक्य बताया है ।
कुछ लोगों के मत के अनुसार भगवान शंकर ने उल्लू का रूप धारण कर इन्हें वैशेषिक दर्शन का उपदेश दिया था ।

अन्य दर्शन से’ ‘विशिष्ट’ और ‘विशेष’ नामक पदार्थ का वर्णन करने के कारण इसे वैशेषिक दर्शन कहा गया है ।
इसके अंतर्गत कणाद ने छह पदार्थ -द्रव्य ,गुण, कर्म ,सामान्य ,विशेष और समवाय माने हैं ।

•वैशेषिक सूत्र कुल 370 है जो 10 अध्याय में विभक्त है ।वैशेषिक दर्शन में दो प्रमाण माने गए हैं प्रत्यक्ष और अनुमान कणाद ने परमाणु वाद को माना है ।न्याय दर्शन की तरह यह भी आरंभवाद को मानता है।

•३.सांख्य दर्शन

यह उपनिषद कालीन है इसके प्रवर्तक महर्षि कपिल है ।
सांख्य शब्द की उत्पत्ति संख्या शब्द से हुई है ।

इस दर्शन में 24 तत्व आत्मक प्रकृति जो जड़ है और 25 व तत्व पुरुष जो चेतन है का विस्तृत वर्णन आया है ।यह ज्ञान हमें मोक्ष की ओर अग्रसर करता है । सांख्य ने तीन प्रमाण माने हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द।

४.योग दर्शन

योग दर्शन के प्रवर्तक ‘महर्षि पतंजलि’ है यही एक ऐसा प्राचीन अध्यात्म ज्ञान का दर्शन है जिसमें वाद-विवाद का कोई स्थान नहीं है प्राचीन दृश्यों के अनुसार मोक्ष का प्रधान कारण योग है।
यहां संख्या के 25 तत्व को माना गया है और ईश्वर को 26 व तत्व माना गया है ।
योग के आठ अंग है- यम ,नियम ,आसन ,प्राणायाम ,प्रत्याहार ,धारणा ,ध्यान और समाधि ।
•8 अंगों की साधना से साधक अर्थात योगी की सिद्धियां आठ प्रकार की है -१ . अणिमा , २. लघिमा , ३. महिमा , ४. प्राप्ति , ५. प्राकाम्य , ६. वशित्व , ७. ईशत्व और ८. यथाकामनाशयिता ।

५. मीमांसा दर्शन

मीमांसा दर्शन के सूत्रकार ‘ महर्षि जैमिनी ‘ हैं । मीमांसा शब्द का अर्थ है किस वस्तु का ‘ यथार्थ वर्णन ‘ , इसे ‘ पूर्व मीमांसा भी कहते हैं ।
वेद में दो भाग है -१ कर्म काण्ड और २. ज्ञान काण्ड । ‘ यज्ञादि ‘ करना ‘ कर्म काण्ड ‘ है , और जीव , जगत तथा ईश्वर के रूप और परस्पर सम्बन्धों का निरूपण ‘ ज्ञान काण्ड ‘ है।
इन्होंने ६ प्रमाण माने हैं -१ . प्रत्यक्ष , २. अनुमान , ३. उपमान , ४. शब्द , ५ , अर्थापत्ति और ६. अनुपलब्धि ।

६. वेदान्त दर्शन

वेदान्त दर्शन का मुख्य विषय परमब्रह्म का स्वरूप वर्णित करना और उसके ज्ञान के साधनों की ओर प्रेरित करना है । इसे ‘ उत्तरमीमांसा ‘ या ‘ ज्ञानमीमांसा ‘ भी कहते हैं ।

इसके सूत्रकार ‘ महर्षि व्यास ‘ जी हैं । इन्होंने केवल ‘ ब्रह्म ‘ की सत्ता को ही स्वीकार किया है जो कि निर्गुण , निर्विकार , चैतन्य , अखण्ड और प्रकाशवान है , किन्तु यही ब्रह्म जब माया से युक्त होता है , तो ‘ सगुण परमेश्वर ‘ कहा जाता है ।

जीव और जगत् की सत्ता को इन्होंने मिथ्या माना है । वेदान्त का मूल उपनिषद् है । वेदान्त शब्द का प्रयोग उपनिषदों में ही सबसे पहले हुआ । वेदान्त का अर्थ है ‘ वेद का अन्त ‘ । बाद में सैद्धान्तिक विरोधों को दूर करने के लिये ब्रह्म – सूत्रों का निर्माण किया । इसका काल ‘ विक्रम पूर्व छ शतक ‘ माना गया है ।

नास्तिक दर्शन

१. चार्वाक दर्शन – इसके प्रवर्तक चार्वाक है । इसे ‘लोकायत , चार्वाक , बार्हस्पत्य ‘ और ‘ जड़वाद ‘ के नाम से जाना जाता है । इन लोगों ने ‘वैदिक धर्म ‘ के ‘ आध्यात्म पक्ष ‘ और ‘व्यवहार पक्ष ‘ दोनों की ही अपेक्षा कर ‘ भूतात्मवाद ‘ का प्रचार किया । चार्वाक शब्द चर्व ( भोजन करना , पीना और मस्ती करना ) शब्द से बना है।

चार्वाक के अनुसार ‘ यही लोक आत्मा का क्रीडास्थल है । परलोक कुछ भी नहीं है , शरीर ही आत्मा है , मृत्यु ही मुक्ति है , धर्म पुरूषार्थ नहीं है , काम ही पुरुषार्थ है , जब तक प्राण है , सुख प्राप्ति की ही चिन्ता करनी चाहिये ‘ ।

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