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RASMANDAP NIRMAN

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• रसमण्डप निर्माण ( Concept of Rasamandap )

सुसज्जित रसशाला के समीप समतल तथा प्रदीप्त स्थान पर अत्यन्त गोपनीय , विस्तृत , कपाट एवं अर्गला से सुशोभित , पताका , छत्र , वितान से युक्त , सभी ओर से सुगन्धित पुष्पमालाओं को लटकाने वाली खूटीयुक्त तथा भेरी , मृदङ्ग , शंख , घड़ियाल , घंटादि वाद्यों से युक्त स्थल पर रसमण्डप का निर्माण करना चाहिए ।

• रसलिङ्ग स्थापना विधि : – रसमण्डप के मध्य में शुद्ध स्वर्णपत्र तीन निष्क ( 12 ग्राम ) तथा शुद्ध पारद नौ निष्क ( 36 ग्राम ) लेकर – इन दोनों को नींबू स्वरस में घोटकर पीठी बनाकर उसका शिवलिङ्ग निर्माण करके नींबू के स्वरस में डालकर दोला यन्त्र के द्वारा काजी में एक दिन स्वेदन करें और स्वच्छ जल से धोकर उस रसलिङ्ग की स्थापना करें । इसके बाद सुन्दर अनेक उपचारों से विधिपूर्वक पूजा करें।

• रसलिङ्ग पूजा विधि : – वेदी के आग्नेयकोण में रसलिङ्ग की स्थापना करके सर्वश्रेष्ठ अघोरमन्त्र ( ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वरूपेभ्यो नमस्तेऽस्तु रूद्ररूपेभ्यः ।। ) का जप तथा अठारह भुजा , शुभ्रवर्ण , पञ्चमुख , तीन आंख तथा नीलकण्ठ प्रेत के ऊपर आरूढ़ शिव के स्वरूप की अवस्थिति का रसलिङ्ग में ध्यान करते हुए , पूजा करें ।

उस मूर्ति के गोद में बैठी हुई एकमुख , चारभुजा , दाहिने हाथ में रुद्राक्ष की माला तथा अंकुश को धारण की हुई , बाँये हाथ के पास तथा अभय प्रदायिनी मुद्रा को धारण की हुई , तप्त स्वर्ण जैसी आभावाली तथा पीत वस्त्र को धारण की हुई देवी का ‘ ॐवाङ्मयौ श्री ‘ इत्यादि मन्त्र से गन्ध पुष्पादि द्वारा पूजन करना चाहिए । ‘

• रसलिङ्ग पूजाफल : – एक हजार करोड़ शिवलिङ्ग का भलीभांति पूजन करने पर जो फल मिलता है , उससे करोड़ गुना फल पारद के शिवलिङ्ग पूजन से प्राप्त होता है । ‘

• रसलिङ्ग दर्शन फल :- हजारों ब्रह्महत्या पाप तथा असंख्य गोहत्या का पाप पारद शिवलिङ्ग के दर्शन से तत्काल नष्ट हो जाते है और रसलिङ्ग स्पर्श से मोक्ष की प्राप्ति होती है , ऐसा भगवान् शिव ने कहा है ।

• रसौषधियों का महत्त्व : –

जिस औषधि की मात्रा स्वल्प हो एवं विपुल गुणों को प्रदान करने वाली तथा शीघ्रता से जिसका दीपन – पाचन हो जाय , वह रसौषधि श्रेष्ठ होती है ।

अल्पमात्रा में प्रयोग , अरुचि उत्पन्न नहीं करना , शीघ्र स्वास्थ्यलाभ पहुँचाना , असाध्य रोगों को भी दूर करना तथा चिरकाल तक सुरक्षित रहना रसौषधि की विशेषता है ।

रसौषधियों द्वारा चिकित्सा करने पर दोष , दूष्य , देश , काल अथवा रोगी परीक्षा की आवश्यकता नहीं होना इसकी शक्ति को दर्शाता है ।

सुसंस्कृत रस द्वारा चिकित्सा दैवी चिकित्सा , चूर्ण , स्नेह , कषाय , लेहादि द्वारा चिकित्सा मानुषी चिकित्सा तथा शस्त्र , दाहादि द्वारा चिकित्सा आसुरी चिकित्सा मानी गयी है ।

“स्वल्पा हि मात्रा विपुला गुणाश्च सद्यो हि तद्दीपनपाचनश्च ।

यस्यास्ति तं चेन्न भजन्ति मास्ते पूर्व जन्मार्जितपापमूढा ।।”

( रसे . चू . 1/33 )

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