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RAS RASAYAN

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रस रसायन ( Concept of Rasa Rasayan )

वृद्धावस्था , रोग , मृत्यु का नाश करने वाले को रस कहा गया है ।

जबकि शरीर के अन्तर्गत प्रशस्त रस रक्तादि धातुओं का निर्माण – पोषण तथा धातुओं की शिथिलता से उत्पन्न रोगों को नष्ट करने में जो औषधि समर्थ हो , उसे रसायन कहते है ।

जिससे शरीर में ओज , कान्ति , तेज , वर्ण , उत्तम स्वर , नवयौवन आदि प्राप्त होने से औषध द्रव्य रसायन कहलाता है ।

रस से द्रव्य का बोध होता है । जबकि रसायन उसका गुणधर्म है ।

रसशास्त्र के समस्त औद्भिद् , जाङ्गम एवं खनिज से प्राप्त द्रव्यों में से अधिकतर द्रव्य रसायन गुण सम्पन्न होते है ।

इसलिए रसद्रव्य संस्कारित होकर रसायनगुणों को उत्पन्न करते है ।

• रसेश्वर दर्शन

 इसमें पारद के द्वारा मोक्ष तथा शरीर को स्थिर बनाने की बातें कही गई है।

 संभवत यह रस शास्त्र का प्रथम सिद्धांत है।

यह शरीर एवं इसके उपभोग के सभी पदार्थ नाशवान् है । इसलिए प्रयत्नपूर्वक शरीर की रक्षा करनी चाहिए ।

रोग और वृद्धावस्था मुक्त स्थिर शरीर से ही मोक्ष सम्भव है । यह मुक्ति ज्ञान और ज्ञान के अभ्यास से स्थिर देह ( दृढ़ देह ) प्राप्ति करके की जा सकती है ।

कुछ लोगों ने भौतिक सम्पन्नता देने वाले स्वर्ण निर्माण को ही इसके विकास का कारण माना है ।

इस धारणा का रसेश्वरदर्शनकार ने खण्डन करते हुए कहा है कि रसशास्त्र का विकास धातुवाद के लिए नहीं होकर शरीर को स्थिर करके मुक्ति प्राप्त करना ही इसका मुख्य उद्देश्य है ।

शरीर में तीन वस्तुएँ प्राण , मन और शुक्र अत्यन्त ही चंचल है । प्राण एवं मन को नियन्त्रित करने का सर्वोत्तम साधन प्राणायाम है ।

हठयोग में प्राणायाम का बहुत महत्त्व है । योगदर्शन में मन और प्राण को वश में करने के लिए यम नियमादि आठ साधन बतलाये है । शुक्र का नाम बिन्दु है , जिसको वज्र भी कहते है ।

इसकी अधोगति को कालाग्नि और ऊर्ध्वगति को कालाग्निरुद्र कहा गया है ।

बिन्दु को ऊर्ध्व करने पर हीमनुष्य अजर – अमर हो जाता है । इस क्रिया को ‘ वज्रोली ‘ कहते है और इसका फल ऊर्ध्व रेता कहा जाता है ।

यही अमरत्व हठयोग की एक साधना है ।

रसेश्वरदर्शन का वर्णन 14 वीं सदी में सर्वप्रथम माधवाचार्यकृत सर्वदर्शन संग्रह में उद्धृत किया गया । इसी क्रम में पारद पर अनेक अनुसन्धान होकर 16 संस्कार विकसित हुए । 16 वां संस्कार क्रामण धातु परिवर्तन संस्कार है

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