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Chyawanprash

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च्यवनप्राशावलेह

• घटक द्रव्य :

1. बिल्व -48 ग्राम

2. अग्निमन्थ -48 ग्राम

3. श्योनाक -48 ग्राम

4. गम्भारी -48 ग्राम

5. पाटला -48 ग्राम

6. बला -48 ग्राम

7. शालिपर्णी -48 ग्राम

8. पृश्निपर्णी -48 ग्राम

9. मुद्गपर्णी -48 ग्राम

10. माषपर्णी -48 ग्राम

11. पिप्पली -48 ग्राम

12. गोक्षुर -48 ग्राम

13. बृहती -48 ग्राम

14. कण्टकारी -48 ग्राम

15. कर्कटशृङ्गी -48 ग्राम

16. तामलकी -48 ग्राम

17. द्राक्षा -48 ग्राम

18. जीवन्ती -48 ग्राम

19. पुष्कर -48 ग्राम

20. अगुरु -48 ग्राम

21. हरीतकी -48 ग्राम

22. गुडूची -48 ग्राम             

23. ऋद्धि -48 ग्राम

24. जीवक -48 ग्राम  

25. ऋषभक -48 ग्राम

26. शटी -48 ग्राम

27. मुस्ता -48 ग्राम

28. पुनर्नवा -48 ग्राम

29. मेदा -48 ग्राम

30. सूक्ष्मैला -48 ग्राम

31. श्वेत चन्दन -48 ग्राम

32. उत्पल -48 ग्राम

33. विदारीकन्द -48 ग्राम

34. वासामूल -48 ग्राम

35. काकोली -48 ग्राम

36.काकनासिका -48 ग्राम

37. आमलकी -500 नग

38. क्वाथार्थ जल -12.288 लीटर ।

अवशिष्ट -3.072 लीटर

39. गोघृत -288 ग्राम

40. तिलतैल -288 ग्राम

41. शर्करा -2.400 कि . ग्रा .

42. मधु -288 ग्राम

43. वंशलोचन -192 ग्राम

44. पिप्पली -96 ग्राम

45. त्वक् -48 ग्राम

46. सूक्ष्मैला -48 ग्राम

47. तेजपत्र -48 ग्राम

48. नागकेशर -48 ग्राम

• निर्माण विधि : –

सुपक्व ताजे 500 नग आँवले लेकर उनको एक कपडे की पोट्टली में बाँध लेते है । क्रम संख्या -1 से 36 तक के सभी घटक द्रव्यों को इमामदस्ते में डालकर यवकुट चूर्ण बनाकर एक पात्र में रख देते है ।

इस पात्र में एक द्रोण पानी भर दिया जाता है और आँवलों की पोट्टली पात्र में डुबोकर उसे एक चौथाई अवशेष रहने तक उबाला जाता है । फिर आँवलों की पोट्टली को अलग करके क्वाथ को छानकर अलग रख लेते है ।

उबले हुए आँवलों से बीजों को निकालकर गूदे की पिष्टी बनाकर उसको कपडा या छननी से चौडे पात्र में छान लिया जाता है । फिर रेशे निकल जाने के बाद गूदे को घृत और तैल से हल्का भूनकर नमी दूर कर लेते है ।

 क्वाथ में शर्करा मिलाकर लेहपाक की अवस्था तक इसे उबालते हैं और उसी समय भर्जित पिष्टी मिलाकर उसे पुनः गर्म करते है , फिर पात्र को अग्नि से नीचे उतार लेते हैं , थोड़ा ठण्डा होने पर उसमें प्रक्षेप द्रव्य क्र . सं . 43 से 48 तक के सूक्ष्म चूर्ण को अच्छी तरह मिलाते है , फिर अवलेह ठण्डा होने पर मधु मिलाकर सुरक्षित पात्र में रख देते हैं ।

• मात्रा :

12 से 24 ग्राम चरक संहिता के अनुसार इसकी मात्रा इतनी खिलानी चाहिए , जिससे भोजन की मात्रा में कमी नहीं है ।

• अनुपान :-

क्षीर मुख्य उपयोग : – कास , श्वास , स्वरभेद , क्षतक्षीण , हृदयरोग , क्षय , रसायन आदि ।

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