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Churna ( Powder )

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चूर्ण ( Powder )

• परिभाषा :

“अत्यन्तशुष्कं यद् द्रव्यं सुपिष्टं वस्त्रगालितम् ।

तत्स्याच्चूर्ण रजः क्षोदस्तन्मात्रा कर्षसम्मिता ।।” ( शा . सं . म . ख . 6/1 )

अर्थात् अत्यन्त शुष्क द्रव्य को अच्छी तरह पीसकर वस्त्र से छान लेने पर चूर्ण बनता है । इसके पर्याय रजः और क्षोद है । इसकी मात्रा 1 कर्ष ( 12 ग्राम ) होती है ।

• निर्माण विधि :

-शुष्क द्रव्य को सर्वप्रथम उदूखल यन्त्र ( इमामदस्ता ) में डालकर एवं कूटपीसकर बारीक वस्त्र से छान लेते हैं । मूदु द्रव्यों का चूर्ण पत्थर की शिला या खरल में पीसकर बनाया जाता है , किन्तु कठिन द्रव्यों को इमामदस्ते में कूटकर ही चूर्ण बनाया जा सकता है ।

वर्तमान में डिसिन्टीग्रेटर ( Disintegrator ) पल्वराइजर ( Pulvriser ) , माइक्रोपल्वराइजर ( Micro Pulvriser ) आदि मशीनों से शीघ्रता से एवं अधिक मात्रा में चूर्ण बनाया जाता है । इन यन्त्रों में विभिन्न नम्बर की चालनियाँ ( Sieves ) लगायी जाती हैं ।

कम मात्रा में चूर्ण ग्राइण्डिंग मशीन ( Grinding Machine ) द्वारा बनाया जाता है ।

• चूर्ण की मात्रा : –

 शार्ङ्गधर संहिता में चूर्ण की मात्रा 1 कर्ष ( 12 ग्राम ) बताई है । यह मात्रा मूदुवीर्य औषधद्रव्य की है ।

मध्यवीर्य औषधद्रव्य के चूर्ण की मात्रा , कर्ष ( 6 ग्राम ) तथा तीक्ष्णवीर्य औषध द्रव्य के चूर्ण की मात्रा / कर्ष ( 3 ग्राम ) होनी चाहिए । गूढार्थदीपिका के मतानुसार बलवान रोगी के लिए 1 कर्ष , अल्पबल में 1 टंक ( 1/4 कर्ष ) , मध्यबल में 2 टंक ( 1/2 कर्ष ) चूर्ण की भक्षण मात्रा है ।

• प्रक्षेप द्रव्य

 चूर्ण में गुड़ मिलाना हो तो समभाग , शर्करा मिलानी हो तो द्विगुण मात्रा में मिलानी चाहिए ।

चूर्ण में हींग मिलानी हो तो भर्जित ( घृत भर्जित ) करके डालनी चाहिए , जिससे वह उत्क्लेद ( जी मिचलाना ) नहीं करे ।

चूर्ण को चाटने के लिए घृत , तैल या शहद मिलाना हो तो द्विगुण मात्रा में मिलाना चाहिए और जहाँ चूर्ण में द्रव ( जल , दुग्ध , तक्र , गोमूत्र आदि ) को मिलाकर पीने को कहा गया हो वहाँ पर चतुर्गुण द्रव लेना चाहिए ।

•  चुर्णादि का अनुपान की मात्रा :

चूर्ण , अवलेह , गुटिका , कल्क का अनुपान वात , पित्त और कफ के रोगों में क्रमशः 3 पल , 2 पल और 1 पल लेना चाहिए ।

• सितोपलादि चूर्ण

घटक द्रव्य :

1. मिश्री  – 16 भाग

2. वंशलोचन 8 भाग

3. पिप्पली 4 भाग

4. सूक्ष्मैला 2 भाग

5. दालचीनी 1 भाग

• निर्माण विधि : – उपरोक्त सभी द्रव्यों को पृथक् – पृथक् इमामदस्ते में कूटकर वस्त्रपूत सूक्ष्म चूर्ण करें और फिर सभी को अच्छी तरह मिलाकर काँच के जार में सुरक्षित रखें ।

मात्रा : -3 से 6 ग्राम

अनुपान : – मधु और घृत मुख्य ।

 उपयोग : – कास , श्वास , प्रतिश्याय , पार्श्वशूल , राजयक्ष्मा , ज्वर , अग्निमान्द्य , अरुचि ।

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