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BHAISHAJY KALPANA VYUTPATTI

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भैषज्य कल्पना व्युत्पत्ति


भैषज्य कल्पना 2 पदों से मिलकर बना है जिसमें भैषज्य का अर्थ औषध से है तथा कल्पना का अर्थ स्वरूप बदलना अर्थात औषध का स्वरूप बदल ना

भैषज्य कल्पना इतिहास

भैषज्य कल्पना के इतिहास को निम्न कालों में विभक्त किया जा सकता है : –

1. वैदिक काल , 2. संहिता काल , 3. मध्य काल या रसशास्त्रीय काल , 4. आधुनिक काल

•1.वैदिक काल : -विश्व के प्राचीनतम साहित्य वेदों में औषध तथा आहार द्रव्यों का प्रचुरता से वर्णन मिलता है । औषधियों की उत्पत्ति के संबंध में भी वर्णन मिलता है । जिसमें तीन युगों पूर्व एक सौ सात औषधियों की उत्पत्ति देवताओं द्वारा हुई है । सैंकड़ों – हजारों बार इन औषधियों द्वारा रोगी मनुष्यों को रोगमुक्त किया गया है ।

ऋग्वेद में सोम नामक औषधि को औषधियों का राजा कहा गया है। ऋग्वेद के नवम मंडल में सोमरस का वर्णन मिलता है तथा इसकी निर्माण विधि का वेदों में वर्णन नहीं मिलता।

अथर्ववेद को भैषज्य वेद भी कहते हैं इसके अंतर्गत पंचविधकषाय कल्पना का प्रयोग प्राप्त होता है। इसमें आसव तथा अरिष्ट का भी वर्णन है।

•2. संहिता काल : -आयुर्वेद में चरक संहिता , सुश्रुत संहिता , काश्यप संहिता , अष्टाङ्ग संग्रह , अष्टाङ्ग हृदय आदि ग्रन्थों में विभिन्न प्रकार की भैषज्य कल्पनाओं का उल्लेख मिलता है ।

( i ) चरक संहिता : -आयुर्वेद की संहिताओं में चरक संहिता का स्थान सर्वोपरि है । इसके अंतर्गत पंच विध कषाय कल्पना का उल्लेख मिलता है अर्थात स्वरस , कल्क , क्वाथ , हिम और फाण्ट।

( ii ) सुश्रुत संहिता : -चरक संहिता के पश्चात् प्राचीनता के क्रम में सुश्रुत संहिता का स्थान है । इसमें 6 प्रकार की मौलिक कल्पनाएँ मानी है अर्थात् क्षीर , स्वरस , कल्क , श्रृत ( क्वाथ ) , शीत ( हिम ) और फाण्ट – इन छः कल्पनाओं को आचार्य सुश्रुत ने मौलिक कल्पनाएँ माना है । लेकिन क्षीर कल्पना का स्वरस में समावेश हो जाने से इसको छठी कल्पना मानना उचित नहीं है ।

( iii ) काश्यप संहिताः आचार्य काश्यप ने चूर्ण , शीत , स्वरस , अभिषव , फाण्ट , कल्क और क्वाथ – इन सात को मौलिक कल्पनाएँ माना है । जिनमें चूर्ण एवं अभिषव कल्पनाओं का पञ्चविध कषाय कल्पना में समावेश हो जाता है ।
( iv ) अष्टाङ्ग संग्रहः व अष्टाङ्ग हृदय : – आचार्य वाग्भट द्वारा विरचित इन दोनों ग्रन्थों में पञ्चविध कषाय कल्पनाओं को ही मौलिक कल्पनाएँ मानी है ।

•3.मध्यम काल या रस शास्त्रीय काल :- इस काल में खनिज द्रव्यों की भी भैषज्य कल्पना का विकास हुआ। जिसमें खनिज द्रव्य का शोधन, मारण ,सत्वपातन , द्रुति पारद के विभिन्न संस्कार तथा अनेक औषधीय कल्पनाओं का विकास हुआ।

•4. आधुनिक काल :- 16 वी शताब्दी के पश्चात आधुनिक काल माना जाता है इस काल में भावप्रकाश ,योगरत्नाकर ,भैषज्य रत्नावली , सिद्धयोगसंग्रह , आयुर्वेद सारसंग्रह आदि ग्रंथ लिखे गए हैं।

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