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AYURVEDA ITIHAS PART – 2

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आयुर्वेद का इतिहास

चरक संहिता ( Charaka Samhita )

उपदेष्टाः पुनर्वसु आत्रेय
लेखक : अग्निवेश
प्रतिसंस्कर्ता : चरक
सम्पूरकः दृढ़बल
ग्रन्थ संरचनाः वर्तमान काल में उपलब्ध चरक संहिता में कुल 8 स्थान , 120 अध्याय एवं सम्पूर्ण विषय 9295 सूत्रों में वर्णित है ।
इन 120 अध्यायों में से 41 अध्याय ( चिकित्सास्थान के 17 अध्याय , सम्पूर्ण कल्प स्थान एवं सिद्धि स्थान ) को दृढ़बल ने सम्पूरित किया ।

क्र स्थान -अध्याय -सूत्र संख्या

1 सूत्रस्थान – 30 – 1952
2.निदानस्थान -08 – 247
3.विमानस्थान -08 -354
4.शारीरस्थान-08 – 382

  1. इन्द्रियस्थान -12 – 378
  2. चिकित्सास्थान -30 – 4904
  3. कल्पस्थान -12 – 382
  4. सिद्धिस्थान -12 – 700

कुल 120 अध्याय 9295 सूत्र 8 स्थान।

अष्टांग संग्रह ( Ashtanga Samgraha )

ग्रन्थकर्ताः वृद्ध वाग्भट
काल : 550 ई .
ग्रन्थ संरचनाः अष्टांग संग्रह में कुल 6 स्थान एवं 150 अध्याय हैं ।
वृद्ध वाग्भट ने गद्य पद्यात्मक पद्धति का अवलम्बन किया है जिसमें गद्य और पद्य दोनों में ग्रन्थ की रचना की है । यही पद्धति चरक , सुश्रुत आदि संहिताकारों ने भी अपनायी है ।

क्र स्थान -अध्याय -सूत्र संख्या
1 सूत्रस्थान – 40 – 2010
2.शारीरस्थान -12 – 512
3.निदानस्थान -16 – 750

  1. चिकित्सास्थान -24 – 1704
  2. कल्पसिद्धिस्थान -08 – 526
  3. उत्तरस्थान – 50 – 3732

कुल 6 स्थान 150 अध्याय 9234 सूत्र

अष्टांग हृदय ( Ashtanga Hrdaya )

ग्रन्थकर्ताः लघु वाग्भट
काल : 7 वीं शती
ग्रन्थ संरचना : इस ग्रन्थ में कुल 6 स्थान और 120 अध्याय हैं । लघु वाग्भट ने नवीन पद्धति का अनुसरण किया है जिसमें केवल पद्यात्मक शैली में संपूर्ण ग्रन्थ की रचना हुई है ।
स्थान – अध्याय सख्या
1.सूत्रस्थान 30
2.शारीरस्थान 6
3.निदानस्थान 16
4.चिकित्सास्थान 22
5.कल्पस्थान 6
6.उत्तरस्थान 40

माधव निदान ( Madhava Nidana )
ग्रन्थकर्ताः माधवकर
काल : 700 ई .
ग्रन्थ पर्याय नाम : रोगविनिश्चय / रूग्विनिश्चय
ग्रन्थ वैशिष्ट्यः कुल अध्याय संख्या : 69

माधव निदान में प्राचीन ग्रन्थों से विषयों का संकलन किया है तथा नवीन विषयों का समावेश कर उनका विशदीकरण भी किया है ।

शार्गंधर संहिता ( Sharangdhara Samhita )
ग्रन्थकर्ताः शार्गंधर
पिता : दामोदर
काल : 13 वीं शती
ग्रन्थ वैशिष्ट्य : शार्गंधर संहिता का मुख्य प्रतिपाद्य विषय भैषज्य कल्पना ‘ है । इस ग्रन्थ में विविध चिकित्सोपयोगी कल्पों की निर्माण प्रक्रियादि विषयों का विशद वर्णन किया गया है ।
इस ग्रन्थ में कुल 32 अध्याय हैं । यह ग्रन्थ 2600 सूत्रों में पूर्ण हुआ है । यह ग्रन्थ 3 खण्डों में विभाजित हुआ है।

भावप्रकाश ( Bhava Prakasha )

ग्रन्थकर्ताः भावमिश्र
पिता : लटकन मिश्र
निवासः कविराज गणनाश्य सेन के अनुसार वाराणसी / कान्यकुलम लब्धा आचार्य प्रियन्नत शर्मा के अनुसार मगध देश ।
काल : 16 वीं शती
अन्य ग्रन्थः गुणरत्नमाला

ग्रन्थ वैशिष्ट्यः भावमिश्र ने इस ग्रन्थ के लेखन का उद्देश्य निम्न शब्दों स्पष्ट किया है : ” प्राचीन मुनियों के निबन्धों से संग्रहीत सूक्तिमणियों के द्वारा चिकित्साशास्त्र में व्याप्त जाइयान्धकार को दूर करने के लिये इस ग्रन्थ की रचना की है ।
यह सम्पूर्ण ग्रन्थ 3 खण्डों एवं 10268 सूत्रों में पूर्ण हुआ है । इस ग्रन्थ में कुल 7 भाग एवं 80 अध्याय हैं । इस ग्रन्थ की संरचना निम्नोक्त है ।

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