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AUSHADH SEWAN KAAL

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औषध सेवन काल ( Posology )

रोगी का रोग निवारण करने के लिए उचित समय पर औषध का प्रयोग करने पर ही लाभ मिलता है । महर्षि अग्निवेश ने औषध सेवन के दश काल का वर्णन किया – :

1 . बलवान रोगी में निरन्न प्रातःकाल

दुर्बल रोगी को लघु तथा पथ्य अन्न में मिलाकर प्रातःकाल

2. अपानवायु विकार में भोजन के पूर्व

3.समानवायु विकार में भोजन के मध्य

4.व्यान वायु विकार में प्रातः भोजन के बाद

5.उदान वायु विकार में सायं भोजन के बाद

6.  प्राण वायु  विकार में ग्रास के साथ

7. प्राणवायु विकार में ग्रासान्तर सेवन

8. श्वास , कास पिपासा में बार – बार

9. हिक्का विकार में भोजन से पूर्व एवं भोजन के अन्त में अर्थात् सामुद्र

10. अरुचि विकार में विविध प्रकार के विचित्र आहार द्रव्यों के साथ हितकर

औषधियों का सेवन

आचार्य सुश्रुत ने भी औषध सेवन के दश कालों का निर्देश दिया है :

1. अभक्त 2. प्राग्भक्त 3. अधोभक्त 4. मध्येभक्त 5. अन्तराभक्त 6. सभक्त 7. सामुद्ग 8. मुहुर्मुहु 9. सग्रास 10. ग्रासान्तर

इसके पश्चात् अष्टाङ्ग संग्रह में औषध सेवन के ग्यारह कालों का निर्देश किया है :

1. अभक्त 2. प्राग्भक्त 3. मध्यभक्त 4. अधोभक्त 5. सभक्त 6. अन्तरभक्त 7. सामुद्ग 8. मुहुर्मुहु 9. सग्रास 10. ग्रासान्तर 11. निशा ( रात्रि )।

1. अभक्त

प्रातः काल सूर्योदय के समय भूखे पेट औषध का सेवन करना।

2.प्राग्भक्त

औषध काल में औषध खिलाकर बाद में अन सेवन कराया जाता है।

3.अधोभक्त

भोजन करने के तुरंत बाद में औषध ग्रहण करना।

4.मध्येभक्त

सर्वप्रथम आधा भोजन करके फिर औषधि सेवन बाद में आधा भोजन करें।

5.अन्तराभक्त

प्रातः काल के भोजन के पच जाना या जीर्ण हो जाने के बाद दोपहर में औषध का प्रयोग करें।

6.सभक्त

औषध को पके हुए आम या अन्य के साथ पका कर दी जाए।

7.सामुद्ग

जिस प्रकार शुक्तियां मोती को आवरण युक्त रखती है उसी प्रकार औषधि को भोजन के मध्य में रख कर देना सामुद्ग हैं।

8.मुहुर्मुहु

औषध को भोजन के लेने या नहीं लेने (भूखे पेट) पर बार-बार प्रयोग किया जाए।

9.सग्रास

औषध को आवश्यकतानुसार सम्यक मात्रा में प्रत्येक ग्रास या कुछ ग्रास के साथ पिंड बना कर दिया जाना।

10.ग्रासान्तर

औषध को दो ग्रहों के मध्य में सेवन करने से इस काल को  ग्रासान्तर कहते हैं।

11. निशा ( रात्रि )

औषध को रात्रि में सोते समय लेने के कारण इस काल को निशा काल कहते हैं

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